Tuesday, 25 September 2018

घर पर बनाए― एसिडिटी नाशक मिक्चर

लूट की भी एक हद होती है लेकिन इसमें हमारी भी कमी है हम सब की आदत हो गई है कि हम कुछ करना ही नहीं चाहते है बस बना-बनाया मिले शारीरिक कष्ट न हो जरा सी भी बुद्धि न लगानी पड़े सब कुछ स्मार्ट तरीके से हो जाए .

* भारत में जो ईनो की 100 ग्राम की शीशी लगभग 80-85 रुपए की मिलती है उसमें केवल 8 रुपए मूल्य की सामग्री है।
बहतर है इसे हम घर पर ही बनाए

★ एसिडिटी नाशक मिक्चर बनाने की विधि-

40 ग्राम निम्बू सत
55 ग्राम मीठा खाने वाला सोडा
05 ग्राम सेंधा नमक

तीनो को मिलाकर कांच की बोतल में रख देवे |
जब प्रयोग में लेना हो तो … एक गिलास पानी 3-4 ग्राम में डाल के पिए
एकदम एनो जैसा बन जाएगा
यह सारा समान कोई भी पंसारी की दुकान मे मिल जाएगा
जहाँ हम एक एनो के पाउच के लिए 5 रु. तक खर्च करते है
वही काम हमारा 1 रु मे हो जाएगा।

पंचगव्य चिकित्सको के अनुभूत प्रयोग


अवश्य आजमाएं
प्राय: सभी को ज्ञात है कि गोमाता अपने पूरे जीवनकाल में दूध भले ही न देती हों लेकिन वह प्रतिदिन और जीवनपर्यंत दो पदार्थ देती है। एक गोमूत्र और दूसरा गोमय। यदि हम भारतीय नस्ल के गोवंश से नित्यप्रति प्राप्त हो रहे गोमूत्र और गोमय का उचित उपयोग बाजार में प्रचलित कर सकें तो गाय मात्र इन दो पदार्थो के कीमत पर ही संपूर्ण जीवन अपना और अपने से जुड़े परिवार का आर्थिक कल्याण का मार्ग प्रशस्त कर देती है।
यहां पर संक्षेप में विभिन्न रोगों में हमारे द्वारा गोमूत्र की सहायता से चिकित्सा कार्य के अनुभूत प्रयोग वर्णित हैं। इन्हें ध्यान में लेने पर सहज ही समझा जा सकता है कि गोमूत्र कितनी चमत्कारिक औषधि है।
  • गोमूत्र को रूमाल पर छिड़क कर उसे नियमित सूंघने से नजला और जुकाम के रोगियों को बहुत लाभ मिलता है।
  • यदि बाल तेजी से झड़ रहें हों और रूसी खत्म नहीं हो रही हो तो बालों में तेल की तरह गोमूत्र को हल्के हाथों से अंदर तक लगाना चाहिए। लगभग एक घंटे तक उसे बालों में सूखने देना चाहिए और उसके बाद बालों को धो लेना चाहिए। कुछ ही दिनों में बालों का झड़ना रूक जाता है और रूसी भी जड़ से खत्म हो जाती है।
  • चेहरे पर अगर झांई है तो गोमूत्र को चेहरे पर लगाकर थोड़ी देर बाद ताजे पानी से धो लेना चाहिए। इससे झांई मिटने लगती है और चेहरा खिल उठता है।
  • गला खराब रहने पर, टांसिल आदि मुंह के रोगों में गोमूत्र का कुल्ला करने तथा गरारे करने से गले और मुंह के रोग दूर करने में सहायता मिलती है।
  • दांतों में दर्द रहने पर गोमूत्र को थोड़ा गरम करके इसे थोड़ी देर तक मुंह में रखना चाहिए और हल्के गरम जल से कुल्ला कर लेना चाहिए। इससे दर्द से आराम हो जाता है।
  • ह्दय रोगों में गोमूत्र के स्वर्णछार के द्वारा अर्जुन छाल के चूर्ण को गूंथकर गोली बना लेनी चाहिए। गोली बनाने के लिए कीकर की गोंद का प्रयोग करना चाहिए। इस गोली को प्रात: और सायं दो-दो गोली ताजे जल से भोजन के एक घण्टे पूर्व लेने से लाभ मिलता है।
  • स्वर्णछार बनाने की विधि अत्यंत सरल है। गोमूत्र को तेज आंच पर पकाना चाहिए। जो झाग उबलते समय निकले उसे किसी पात्र की सहायता से तब तक निकालते रहना चाहिए जब तक कि गोमूत्र से झाग निकलना बंद न हो। फिर आंच से गोमूत्र उतारकर उसे ठण्ड़ा कर लेना चाहिए। इस प्रक्रिया में तलछट के रूप में यूरिया नीचे बैठ जाता है। गोमूत्र को सावधानी से निथार लेना चाहिए ताकि यूरिया उसके साथ ना निकलने पाए। इस प्रकार शोधित गोमूत्र ही स्वर्णछार कहा जाता है। इसमें से अमोनिया तत्व झाग के रूप में निकल जाता है।
  • समस्त वात रोगों में गोमूत्र का सेवन लाभदायी है। निर्गुण्डी चूर्ण में कीकर की गोंद उचित मात्रा में मिलाकर उसे स्वर्णछार गोमूत्र से गूंथ लें। इस प्रकार गोली बनाकर उसका भोजन पूर्व सुबह और शाम सेवन करें। यह वात जनित व्याधियों में अनुभूत प्रयोग है।
  • मधुमेह यानी शुगर के रोगी त्रिफलाचूर्ण को स्वर्णछार गोमूत्र में गूंथकर उसकी गोली बना लें। चार-चार गोली भोजन से पूर्व ताजे जल से लेने पर बहुत ही लाभ मिलता है।

पंचगव्य का निर्माण

गाय के दूध, दही, घी, गोमूत्र और गोबर का पानी को सामूहिक रूप से पंचगव्य कहा जाता है। आयुर्वेद में इसे औषधि की मान्यता है। हिन्दुओं के कोई भी मांगलिक कार्य इनके बिना पूरे नहीं होते।

पंचगव्य का निर्माण गाय के दूध, दही, घी, मूत्र, गोबर के द्वारा किया जाता है। पंचगव्य द्वारा शरीर के रोगनिरोधक क्षमता को बढ़ाकर रोगों को दूर किया जाता है।

 गोमूत्र में प्रति ऑक्सीकरण की क्षमता के कारण डीएनए को नष्ट होने से बचाया जा सकता है। गाय के गोबर का चर्म रोगों में उपचारीय महत्व सर्वविदित है। 
दही एवं घी के पोषण मान की उच्चता से सभी परिचित हैं। दूध का प्रयोग विभिन्न प्रकार से भारतीय संस्कृति में पुरातन काल से होता आ रहा है। 
घी का प्रयोग शरीर की क्षमता को बढ़ाने एवं मानसिक विकास के लिए किया जाता है। 
दही में सुपाच्य प्रोटीन एवं लाभकारी जीवाणु होते हैं जो क्षुधा को बढ़ाने में सहायता करते हैं। पंचगव्य का निर्माण देसी मुक्त वन विचरण करने वाली गायों से प्राप्त उत्पादों द्वारा ही करना चाहिए।

सूर्य नाड़ी वाली गायें ही पंचगव्य के निर्माण के लिए उपयुक्त होती हैं। देसी गायें इसी श्रेणी में आती हैं।

 इनके उत्पादों में मानव के लिए जरूरी सभी तत्त्व पाये जाते हैं। 

महर्षि चरक के अनुसार गोमूत्र कटु तीक्ष्ण एवं कषाय होता है। इसके गुणों में उष्णता, राष्युकता, अग्निदीपक प्रमुख हैं। 

गोमूत्र में नाइट्रोजन, सल्फुर, अमोनिया, कॉपर, लौह तत्त्व, यूरिक एसिड, यूरिया, फास्फेट, सोडियम, पोटेसियम, मैंगनीज, कार्बोलिक एसिड, कैल्सिअम, नमक, विटामिन बी, ऐ, डी, ई; एंजाइम, लैक्टोज, हिप्पुरिक अम्ल, कृएतिनिन, आरम हाइद्रक्साइद मुख्य रूप से पाये जाते हैं। यूरिया मूत्रल, कीटाणु नाशक है। पोटैसियम क्षुधावर्धक, रक्तचाप नियामक है। सोडियम द्रव मात्रा एवं तंत्रिका शक्ति का नियमन करता है। मेगनीसियम एवं कैल्सियम हृदयगति का नियमन करते हैं।

तीन भाग देसी गांय का गोबर का रस, 
तीन ही भाग देसी गांय का कच्चा दूध, 
दो भाग देसी गांय के दूध की दधि, 
एक भाग देसी गांय का घृत 
इन्हें मिश्रित कर लें विष्णु धर्म में कहा गया है जितना पंचगव्य बनाना हो उसका आधा अंश गौमूत्र का होना चाहिए। 

अर्थात उक्त मिश्रण जितनी मात्र में हो उतने ही मात्र में गौमूत्र होना चाहिए, शेष कुशाजल होना चाहिए।

गोमूत्रं गोमय क्षीरं दधि सर्पि कुशोदकम्। 
पंचचगव्य मिदम् प्रोक्तम्महापातक नाशनम् ॥

पंचगव्य क्या है?

पंचगव्य निर्माण और फायदे

    पंचगव्य का धार्मिक महत्व तो है ही साथ ही मानव जीवन के स्वास्थ के लिए भी कई गुना इसका महत्व है। पंचगव्य क्या है? पंचगव्य गाय के दूध, घी, दही, गोबर का पानी और गोमूत्र का मिश्रण है। इन पाचों चीजों को मिलाने से जो तत्व बनता है वो पंचगव्य कहलाता है। आयुर्वेद में इसे औषधि के रूप में माना गया है। पंचगव्य रोग नाशक औषधि है क्योंकि गाय के गोबर में चर्म रोग को दूर करने की क्षमता है। गाय के मूत्र में आक्सीकरण की क्षमता की वजह से डीएनए को खत्म होने से बचाया जा सकता है। 
     गाय के घी से मानसिक और शरीर की क्षमता बढ़ती है। और गाय के दूध से बनी दही में प्रोटीन शरीर को कई रोगों से बचाती है। इसलिए देसी गाय का पंचगव्य उत्तम होता है। गाय के हर एक उत्पाद में मानव के जीवन के लिए बेहद उपयोगी तत्व छिपे हुए हैं। भारतीय नस्ल की गाय में ही सबसे अधिक गुण पाए जाते हैं। 
पंचगव्य के बारे में महर्षि चरक का कहना था कि गोमूत्र कषाय और काफी तेज होती है। जिसकी मुख्य वजह है इसमें मौजूद यूरिक एसिड, अमोनिया, नाइट्रोजन, पोटेसियम, मैंगनीज के साथ-साथ विटामिन बी, ए, और डी का पाया जाना। जो ब्लड प्रैशर को नियंत्रित करते हैं। इसके अलावा यह पेट संबंधी रोगों को भी दूर करने में लाभदायक होता है।
   देसी गाय के गोमूत्र और गोबर बेहद शक्तिशाली हैं। यदि वैज्ञानिक तौर से देखा जाए तो 23 प्रकार के प्रमुख तत्व गाय के मूत्र में पाए जाते हैं। इन तत्वों में कई मिनरल, विटामिन और प्रोटीन पाए जाते हैं।
गाय के गोबर को खेत में डालने से खेत के लिए लाभकारी जीवाणु मिलते है। गाय के गोबर की खाद से पैदा हुआ अन्न शरीर को हर तरह की बीमारियों से बचाव करता है।
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार भारतीय गाय की रीढ की हड्डी में सूर्य केतु नाम की एक अद्भुद नाड़ी होती है जब सूर्य की किरणें इन पर पड़ती है तो यह नाड़ी सूर्य की किरणों के साथ मिलकर सूक्ष्म कणों को बनाती है जिस वजह से देसी गाय का दूध हल्का पीला होता है। गाय का दूध अन्य दूसरे जानवरों के दूध से सबसे ज्यादा पौष्टिक और शरीर को निरोगी करने वाला होता है।   
गाय का दूध हो चाहे घी हर एक-एक उत्पाद इंसान को बीमारियों से बचाने वाला होता है। इसलिए हर इंसान को आपने और अपने परिवार के लिए गाय के दूध का प्रयोग करना चाहिए। क्योंकि गाय का दूध पीने से कई तरह की बीमारियां शरीर को नहीं लगती हैं। और जो बिमारियां शरीर पर पहले से ही हैं उन्हें भी गाय का हर एक उत्पाद खत्म कर देता है।

औषधियों के लिए गोमूत्र और गोबर एकत्रित करने के 10 नियम

पंचगव्य (गोमूत्र और गोबर एकत्रित करने के नियम)

पंचगव्य
  1. पंचगव्यों से संबंधी सामान्य नियम : दूध, दही अथवा छाछ, नवनीत (मक्खन) अथवा घी, गोमूत्र एवं गोमय (गोबर) से सर्व गव्य भारतीय गाय के ही लें ।
  2. घी संबंधी नियम : औषधियों में प्रयोग किया जाने वाला घी पारंपरिक पद्धती से, अर्थात दूध से दही जमाना, दही मथकर मक्खन बनाना तथा इस मक्खन को पिघलाकर घी बनाना, इन चरणों में बनाया गया हो ।
  3. औषधियों के लिए गोमूत्र और गोबर एकत्रित करने के 10 नियम
  • गाय की देह से संबंधित 4 नियम
  1. स्वास्थ्य : गोवंश निरोगी होना चाहिए। रोगी गाय-बैलों के गव्य न लें । गाय-बैल के कान ठंडे हों तथा उनके होंठ सूखे हुए हों, तो समझ लें कि वे अस्वस्थ हैं ।
  2. आयु : गोवंश जननक्षम बनने पर अर्थात साधारणतः उनके जन्म के ढ़ाई वर्ष उपरांत ही उनके मूत्र का उपयोग औषधि के लिए करना चाहिए, उसके पूर्व उसका उपयोग न करें ।
  3. आहार : गोवंश दिनभर एक ही स्थान पर बंधा हुआ न रहे । दिन में न्यूनतम 5 घंटे जंगल में चरने वाला हो । चरने वाले गोवंश के मूत्र में ही असाध्य रोगों में लाभकारी औषधीय गुण धर्म होते हैं ।
  4. प्रजनन : बैल का गाय से संगम होने पर 2- 3 दिन गाय का मूत्र औषधि के लिए नहीं लेना चाहिए । गाय प्रसूत तो होने से 45 दिन पूर्व तथा प्रसूत होने के 45 दिन पश्चात उसका मूत्र नहीं लेना चाहिए, क्योंकि इन दिनों में उसके मूत्र में गर्भजनित अशुद्धि रहती है ।
  • काल से संबंधित 3 नियम
  1. तिथि : एकादशी और अमावस्या इन तिथियों पर गोमूत्र और गोमय एकत्रित नहीं करनी चाहिए । एकादशी के दिन चंद्र की किरणें पृथ्वी पर एक विशिष्ट कोण से आती हैं तथा अमावस्या के दिन आकाश में चंद्र दिखाई नहीं देता । इसलिए गोमूत्र पर चंद्र किरणों का संस्कार नहीं होता । पूर्णिमा की रात बना गोमूत्र सर्वधिक फलदायी होता है, क्योंकि उस पर चंद्र किरणों का सुयोग्य संस्कार होता है ।
  2. ऋतु : सूर्य जब पृथ्वी से अत्यधिक दूर होता है अर्थात अत्यधिक शीत रितु में गोमूत्र और गोबर एकत्रित नहीं करना चाहिए, क्योंकि ऐसे गोमूत्र में सूर्य की अपेक्षित उर्जा पर्याप्त मात्रा में नहीं होती । वर्षा ऋतु में वातावरण में मेघ छाए हुए होते हैं तथा दिनभर चंद्र-सूर्य दिखाई नहीं देते उस समय गव्य एकत्रित नहीं करने चाहिए ।
  3. ग्रहण : चंद्रग्रहण अथवा सूर्य ग्रहण के दिन भी एकत्रित नहीं करने चाहिए ।
  • गव्यों से संबंधित 2 नियम
  1. भूमि से संयोग : भूमि पर पड़े गव्य औषधि के लिए नहीं लेने चाहिए । उन्हें ऊपर ही झेलना चाहिए ।
  2. संग्रह पत्र : गव्य धातु के पात्रों में एकत्रित नहीं करनी चाहिए । गव्य एकत्रित करने के लिए मिट्टी,कांच अथवा उच्च स्तरीय प्लास्टिक के पात्र का उपयोग करना चाहिए । गोमय के लिए वृक्ष के बड़े पत्ते का अथवा बांस से बनी छोटी टोकरी का उपयोग करना चाहिए ।
औषधियों के लिए गव्यों का उपयोग करना हो, तो गव्य एकत्रित करते समय उक्त नियमों का पालन आवश्यक है । कृषि अथवा गृह उपयोगी उत्पाद अर्थात मच्छर प्रतिबंधक धूपबत्ती और बर्तन स्वच्छ करने वाला चूर्ण बनाने हेतु इन नियमों का पालन करने की आवश्यकता नहीं है ।
  • गोपालक की श्रद्धा से संबंधित एक नियम
  1. गव्य एकत्रित करते समय गौ माता साक्षात देवता है, ऐसा गोपालक का भाव होना चाहिए । गव्य एकत्रित करने से पूर्व गौ माता से भावपूर्ण प्रार्थना करें ।
  • गोमूत्र कब और कैसे एकत्रित करें? : गोमूत्र एकत्र करने के 10 नियमों का पालन करें और गाय जब मूत्र करे तब उसे एकत्र करें ।
    • गोमूत्र लेने के लिए जाते समय-मन-ही मन गाय के प्रति कृतज्ञता व्यक्त कर आगे दी हुई प्रार्थना करें ।‘ हे गौमाता, आपका मूत्र साक्षात अमृत ही है । आपकी कृपा से मैं औषधि बना सकता हूं । ‘आपसे मिलने वाले इस अमृत से रोगी के रोग दूर हों’, यह आपसे प्रार्थना है ।
    • सामान्यतः दूध देने के पहले गाय एक बार गोमूत्र देती है । प्रातः और सायं गाय का दूध निकालते समय गोमुत्र इकट्ठा करें ।
    • सायंकाल गाय का दूध निकालने के पश्चात रात में 3-3 घंटे पर गाय को उठाकर मूत्र त्यागने का अभ्यास कराया जा सकता है । सायंकाल 6:00 बजे दूध दूहने के पश्चात रात में 9,12 और 3 बजे गोमूत्र इकट्ठा करें ।
    • गाय बैठी हो, तब उसे प्रेम से थपथपा कर उठाएं । उसके उठने पर उसकी पीठ को धीरे-धीरे थपथपाएं अथवा मूत्र मार्ग को धीरे से उंगली लगाएं । इससे गाय को मूत्र करने की उत्तेजना मिलती है और वह मूत्र करने लगती है । इस प्रकार अभ्यास कराने पर गाय निर्धारित समय पर मूत्र करने लगती है ।
    • गाय का अभ्यास होने तक आरंभ में कुछ दिन गोमूत्र अल्प मिलता है । एक बार अभ्यास हो जाने पर ‘गोपालक मूत्र लेने के लिए आया है’, यह समझने पर वह अपने आप खड़े होकर मूत्र करने लगती है । कभी-कभी हमें गाय के पास पहुंचने में विलंब हो जाता है, तब वह हमारे पहुंचने तक मूत्र रोके रहती है । गाय से हम जितना प्रेम करते हैं उस से दस गुना वह हम से प्रेम करते हैं ।
  • एकत्र किए गोमूत्र का उपयोग और भंडारण
  • पीने के लिए ताजे गोमूत्र का उपयोग करें ।
  • रात में एकत्र किए गए गोमूत्र को प्रातः सूर्योदय के पहले अर्क यंत्र में डालकर गोमूत्र चंद्रमा अर्क बनाना आरंभ करें ।
  • शेष बचे गोमुत्र को अच्छी श्रेणी के प्लास्टिक के पीपों में भरकर रखें । इस गोमूत्र का उपयोग अन्य औषधियां बनाने हेतु कर सकते हैं ।
  • गोठे की नाली से बहने वाले गोमूत्र का उपयोग क्रषि के लिए करें ।

cow urine therapy


 रोग निदान 


                                          
1 – अगर आपका छोटा बच्चा बहुत बीमार रहता हो तो गौमाता जब अपने बछड़े को दूध पिला रही हो तो उस बछड़े के मुख के पास झाँग निकलता हैं। उस झाँग को लेकर अपने बच्चे को चटवाओ , उस झाँग मैं बहुत औषधि युक्त ताकत होती हैं , आपका बच्चा ठीक हो जायेगा।

2 – अगर कोई व्यक्ति ये चाहे की उसको जिंदगी मैं कभी बुखार न आये तो भारतीय गौमाता का घी मैं नीम के पत्ते डाल कर गरम कर ले और आधी कटोरी घी ४ – ५ दिन पी ले तो उसको जिंदगी मैं कभी बुखार नहीं आएगा। आपको डेंगू का बुखार है  तो भी ये उपाय करे आपका डेंगू – मलेरिया सब भाग जायेगा।

3 – एक माता को कैन्सर हो गया था डॉक्टर ने कहा की अभी वो ज्यादा दिनों तक जिन्दा नहीं रहेगी। उनको घर मैं ले जाओ और कुछ पुण्य का काम कराओ। वो माता के पतिदेव एक गौमाता को घर मैं ले आये , क्योकि मरने के बाद एक ब्याही हुई गाय का दान करना पड़ता हैं। उस पतिदेव ने गाय का दूध , घी , दही , गौ मूत्र और गोबर का रस मिला करके पंचगव्य अपनी पत्नी को पिलाना चालू किया क्योकि उसने गौ कथा मैं ऐसा ही सुना था की पंचगव्य का पान करने वाले व्यक्ति के सारे रोग मिट जाते हैं। १० दिन मैं वो माता को ३५ % आराम मिल गया। १ महीने मैं वो माता संपूर्ण स्वस्थ हो गयी।

4  – अगर किसी व्यक्ति को बहुत क्रोध आये तो गौमाता के पास जाये और गौमाता के शिंगो पर रोज तेल लगाया करे। थोड़े दिनों के बाद आपको कभी क्रोध नहीं आएगा।

5 – अगर किसी को ब्लड प्रेशर की समस्या हो तो आपके घर की गौमाता या फिर नजदीक की गौशाला मैं जाये और गौमाता के कंधे पर से पीठ तक २१ बार हाथ फेरे तो आपका ब्लड प्रेशर सामान्य हो जायेंगा।
6 – गौ मूत्र को गरम करे और जब वो एक दम गाढ़ा हो जाये फिर उसकी छोटी सी गोली बना दे और उस गोली को सुबह और शाम ले लेना। गौमाता की कृपा से डायबिटीस चला जायेंगा। 

Sunday, 23 September 2018

गौ-चिकित्सा – खूरपका ( मुहँपका ) ( Foot Mouth Dis)


खूरपका ( मुहँपका ) ( Foot Mouth Disease ) 
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यह रोग भारत में ही नही , ब्लकी विश्व के अन्य देशों में भी एक अत्यन्त संक्रामक रोग माना जाता हैं । यह रोग फटे खुर वाले पशुओं में प्राय: पाया जाता हैं । यद्यपि यह रोग संाघातिक नहीं हैं । भारतवर्ष में शायद ही कोई पशु इस रोग से मरता हो किन्तु यह छूत का रोग होने के कारण यह वर्षभर चलता रहता हैं और हर देश में होता हैं इस रोग की छूत हवा के साथ सभी पशुओं तक तथा सभी उम्र के पशुओं तक पहुँच जाती हैं । इस रोग के रोगी के फफोलें ठीक होने के बाद भी विषाणु पशु के खरोंट ( खुरन्ड ) मे ३० दिनों तक जीवित रहते हैं जब खरोंट उतरकर घास आदि में गिर जाते हैं तो घास में भी विषाणु लगभग १५ दिनों तक जीवित रहते हैं । भूसी व चोकर में तो विषाणु ४ महीने तक जीवित रहते हैं । किन्तु गर्मी व धूप से ये आसानी से मर जाते है । १% सोडियम हाइड्रोक्साइड , ४% सोडियम काबोर्नेट और १%,सोडियम फार्मोंलिन जैसे क्षार इनको मारने में सर्वाधिक सफल सिद्ध हुए हैं । इस रोग के शिकार पशुओं में दूधारू पशुओं का दूध कम हो जाता हैं और मैहनती पशुओं की कार्यक्षमता घट जाती हैं । 

लक्षण – खूरपका बिमारी से पीड़ित पशु सुस्त व शिथिल पड़ जाता हैं।समस्त शरीर में कँपकँपी होने लगती हैं साधारण बुखार हो जाता हैं , पशु के मुँह,सींग व पैरों का तापमान बढ़ जाता हैं । कान ठन्डे पड़ जाते हैं और साँसों की गति बढ़ जाती हैं , पशु के मुँह में लार व झाग दिखाई देने लगते हैं । पशु के मुँह से चप- चप की आवाज़ आने लगती हैं वह अपना मुँह बार- बार खोलता है और बन्द करता हैं यह दशा २-३ दिनों तक रहती हैं । दो दिन के बाद पैरों में छालें पड़ जाते हैं ,पैर मवाद से भर जाते है बुखार कम हो जाता हैं । ज्यों – ज्यों बिमारी बढ़ती जाती है , जबड़ों , मुँह ,जीभ में छालें बढ़ते जाते हैं इसी प्रकार खुरों के बीच में घाव बढ़ते है और उनमें कीड़े पड़ जीते है । खूरपका रोग व चेचक रोग को पहचानने में समस्या हो जाती हैं।चेचक में केवल मुँह में छालें पड़ जाते हैं और दस्त आरम्भ हो जाते हैं किन्तु खूरपका में ऐसा नहीं होता हैं । इसमें सिर्फ़ मुँह में और खुर में ही छालें पड़ते हैं । इस रोग के छालें हमेशा पीली – सी झिल्ली से ढके रहते हैं अन्य बिमारी के छालें लाल रहते हैं यह इस रोग की विशेष पहचान हैं । इस रोग के विषाणु मुँह , जीभ , आंत अथवा खुरों के बीच की खुली जगह में होते हैं और इसी प्रकार किसी अंग की चोट के रास्ते शरीर में घुस जाते हैं । यदि किसी स्वस्थ पशु को कोई छूत की बिमारी लगी हैं तो उसके लक्षण दिखने मे २ से ५ दिन तक का समय लग जाता हैं । शुरूआत में पशु अत्यधिक सुस्त रहता हैं उसे भूख नहीं लगती हैं तथा बुखार आ जाता हैं जिससे उसके शरीर का तापमान १०२ डिग्री से १०५ डिग्री तक हो जाता हैं किन्तु इन लक्षणों से प्राय: इस रोग का पता नहीं चलता हैं । कुछ समय के बाद पशु अचानक ही लड़खड़ाने लगता हैं , उसके होंठ लटक जाते हैं और मुँह से लार टपकने लगती हैं । ये लक्षण एक साथ समूह के अनेक पशुओं में प्रकट होते हैं । खुरों के साथ जुड़ी हुई पैरों की खाल में फफोलें पड़ जाते हैं , पशु बार- बार पैरों को झटका मारता हैं और कभी- कभी जीीभ से चाटता हैं । फिर उसके मुँह व जबड़ों तथा जीभ पर भी छालें पड़ जाते हैं । यह छालें १८ से २४ घन्टे के अन्दर फूट जाते है , छालें फुटने पर उनमें से जो पानी निकलता हैं , उसमें इस रोग के विषाणु भरे होते हैं । छालों के स्थान पर लाल- लाल घाव बन जाते हैं रोगी पशु की हालत दिन- प्रतिदिन बिगड़ती जाती हैं । क्योंकि वह ठीक प्रकार से खा- पी नहीं पाता हैं । दूधारू पशु का दूध घट जाता हैं और रोग बढ़ने पर पशु के नथुनों में भी छालें पड़ जाते हैं । 

विशेष — वैसे तो यह रोग वर्षभर चलता रहता हैं पर मार्च , अप्रैल ,अक्तुबर,दिसम्बर में विशेष कर हो जाता हैं । इस रोग में हमारे देश में पशु कम मरते है , वैसे तो अपनी शुद्ध देशी गाय में यह रोग होता नहीं हैं यह नश्ल बदलकर जो दौगली गाय है या उनमें जर्सी आदि का असर है तो यह रोग हो जाता हैं । लेकिन जो रोगी हो जाता है तो उसकी दूध उत्पादन क्षमता घट जाती हैं व सन्तानोत्पत्ति के लिए अयोग्य हो जाता हैं । भैंस के १ साल से छोटे बच्चों को यह रोग कम होता हैं और डेढ़ साल से तीन साल के पशुओं को यह रोग बहुत जल्दी लगता हैं तथा इस आयु में यह रोग बार- बार हो जाता हैं तथा बजे पशुओं या बूढे पशुओ में कम होता हैं तथा उन पर दूबारा रोग हमला नहीं करता है यह सभी प्रकार के पशु दूधारू या अन्य सभी को होता है लेकिन भैंसों का दूध तेज़ी से घटता है और गाय पर कम असर होता हैं । यह रोग ८ दिन से लेकर २८ दिन तक चलता रहता हैं जबकि यह रोग कमज़ोर पशुओं में कम होता हैं अच्छे मज़बूत पशुओं में ज़्यादा होता हैं । 

रोग के बचाव – 
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१ – रोगी पशु को स्वस्थ पशुओं से तुरन्त अलग कर देना चाहिए । 

२ – रोगी पशु को बाँधने के स्थान चूना व फिनाइल डालकर रोगाणमुक्त कर देना चाहिए । 

३ – रोगी पशुओं को गन्दगी व सीलनयुक्त स्थान पर नहीं रखना चाहिए । 

४ – रोग फैलने के मौसम में सभी पशुओं के घावों व खुरों पर कपूरादि तेल लगाते रहना चाहिए । 

५ – रोगी पशु की टहल करने वाले व्यक्ति को दूसरे पशुओं के पास नहीं जाना चाहिए । 

६ – टहल करने वाले को अपने कपड़े ऊबाले पानी में धोकर रोगाणु मुक्त होना चाहिए । 

७ – इस रोग के टीके लगाने चाहिए । 

८ – पशुओं को पैरडुब्बी द्वारा बचा जा सकता है और बीच- बीच में कराते रहना चाहिए । 

९ – रोगी पशु का झूठा पानी- खाना अन्य पशु को नहीं देना चाहिए । 

# – खूरपका रोग मे पशुपालकों को यह ध्यान रखना चाहिए । चूँकि यह रोग हवा के माध्यम से भी फैलता हैं , जिधर से हवा चल रही हो उधरबिमार पशुओं को न बाँधे नहीं तो स्वस्थ पशु बिमार हो जायेंगे स्वस्थ पंशु को बिमार पशु की छुई हूई हवा न लगे । पशु उन्हें जौं या चने का सत्तु पिलाना चाहिए । अलसी की लई खिलाने से पशु की शक्ति कम नहीं होती हैं । चावल का माण्ड देने से भी आराम मिलता हैं । लाल दवा मिला पानी पिलाना भी गुणकारी हैं । 

# – खूरपका में बुखार की तीन अवस्थाएँ होती है तो उसका इलाज की भी तीन अवस्थाओं में होना चाहिए , बुखार के साथ- साथ इस रोग की प्रथम अवस्था चालू हो जाती हैं जिसकी दवा इस प्रकार हैं – 

१ -औषंधि – कालीमिर्च पावडर २ तौला , गाय का घी २५० ग्राम ,गुनगुना करके दोनो को आपस में मिलाकर पशु को सुबह- सायं दिन में दो बार ३-४ दिन तक देने से लाभ होता हैं । 

२ – औषधि – पीपल के पेड़ के ऊपर जो नीम का का पेड़ उगा हो उसकी पत्तियाँ २५० ग्राम , पानी में पीसकर उसमें गाय का घी २५० ग्राम गुनगुना करके मिलाकर पशु को पिलाने से लाभ होता हैं । 

३ – औषधि – पुराना गुड १ किलो , सौँफ २५० ग्राम , गरमपानी २ लीटर मिलाकर पिलाने से लाभँ होता हैं । 

४ – औषधि – घुँघुची लाल ( गुञ्जाफल )की २५० पत्तियाँ पानी में पीसकर देने से बुखार उतर जाता हैं ।

५ – औषधि – चावल का माण्ड २ किलो , पुराना गुड १ किलो मिलाकर पिलाने से बु खार उतर जाता हैं ।

६ – सफ़ेद तिल को पानी में पीसकर पिलाने से पशु का बुखार उतर जाता हैं । 

७ – चिरायता पावडर ३ तौला , साँभरनमक पावडर ३ तौला , कलमीशोरा १५ माशा और डेढ़ छटांक गुड़ मिलाकर पानी मे मिलाकर पिलाने से लाभ होता हैं । 

८ – पैरों के घावों पर ५ भाग कोलतार और १ भाग नीला थोथा मिलाकर तैयार की गई मलहम लगाई जाती हैं , जोकि किटाणुनाशक , विषमारक तथा घावपूरक होती हैं । 

९ – बोरिकएसिड पावडर गरम पानी में मिलाकर उससे पशु का मुँह , थन तथा खुरों को धोवें और उसी से सेकें । गि्लसरीन में थोड़ा-सा पावडर मिलाकर मुँह के छालों में लगाने से गुणकारी होता हैं । 

खूरपका की द्वितीय अवस्था – 
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# – बुखार उतर जाने के बाद घाव धोने की आवश्यकता पड़ती हैं । पशु उस अवस्था में चलने- फिरने में असमर्थ हो जाता हैं । घावों को धोने के लिए इन दवाओं का प्रयोग करना चाहिए — 

१ – फिटकरी को गरम पानी में डालकर पशु का मुँह व खुर धोने चाहिए । 

२ – बबूलछाल , ढाकछाल , जामुनछाल, आँवलाछाल ,और नीम की छाल सममात्रा में लेकर काढ़ा बनायें ।इन दवाओं के काढें से पशु के पैरों को धुलवायें काढ़ा बनाने कि विधी इस प्रकार हैं – सभी दवाओं को पानी में डालें जितने पानी में डूब जायें उससे डबल पानी में पकायें । जब तीन हिस्सा पानी जलकर एक हिस्सा पानी रह जाये तब धुलाई का कार्य किया जायें और मुँह व पैर में ज़ख़्म यदि अधिक हो गये हो तो उन्हें काढ़े से भलीप्रकार से धोना चाहिए । शहद या शीरा हो तो अच्छा है नहीं तो तिल या नारियल तेल या गाय का घी २५० ग्राम में फिटकरी पावडर , कत्था , सुहागाफूला, खाने का सोडा आधा- आधा टीस्पुन ( चम्मच ) मिलाकर दवा का लेप करना चाहिए । दवा लगाकर कपड़े की पट्टी बाँधकर उसपर मिट्टी लगा देनी चाहिए जिससे उसमें गोबर न घुसे और पशु मुँह से खोल न दें । 

# – घाव पर मरहम भी लगा सकते है , मरहम इस प्रकार बनायें – – 

१ – औषधि – अलसी का तेल २५० ग्राम , कपूर १ छटांक , डेढ़ तौला तारपीन का तेल , तीनों को आपस में मिलाकर घाव पर लगाने से आराम आता हैं । 

२ – औषधि – तुतिया १ भाग , अलकतरा १० भाग , दोनों को मिलाकर घाव पर लगाकर पट्टी बाँधने से आराम आता हैं । 

३ – औषधि – नीम की पत्तियों को पानी में पीसकर घाव पर लगाने से आराम आता है । 

४ – औषधि – बर्रे का डढुआ ( बर्रे के दानों को मिट्टी के बर्तन में बन्द कर आग में पकाकर तेल निकाले ) इसके बाद पशु के घाव पर लगायें तो आराम आता हैं । 

५ – आयुर्वेद में डुब्बी प्रणाली ( Foot Bath ) सर्वोत्तम मानी गई हैं । इसकी विधी इस प्रकार हैं – – 
गौशाला या डेयरी या पशुओ के बँधने के स्थान पर या आसपास में एक ऐसा स्थान बनाना चाहिए जो १२ फूट लम्बा व १ फ़िट गहरा रपटा बनाना चाहिए यानि गड्ढा लम्बाई की दिशा में जिधर से शुरूआत होती है वहाँ हर फ़ुट पर डेढ़ – डेढ़ इंच गहरा करते चले और बीच तक गहरा करें और अन्तिम तक बीच से डेढ़- डेढ़ इन्च गहराई कम करते चले आये और साईड में दिवार दो-दो फ़िट उँचा कर दें और गड्ढे के अन्दर सिमेन्ट कर देना चाहिए जब-जब पशुओं में खूरपका रोग आये इस गड्ढे में पानी भर कर उसमें फिनाइल या लाल दवा पौटेशियम परमैग्नेट डालकर पशुओं को इस पानी में से निकालना चाहिए इससे रोग की रोकथाम होगी । 

६ – औषधि – बबूल छाल ( कीकर छाल ) २५० ग्राम , जवासे का हरा पौधा १ छटांक , फिटकरी ११ छटांक , हराकसीस आधा छटांक , कत्था आधा छटांक , सबको लोहे के बर्तन मे ४ लीटर पानी में उबालें । जब तीन चौथाई पानी रह जाये तो कपड़े से छानकर थोड़ा – सा कपड़े धोने का सोडा मिला दें । यदि उक्त दवाओं में एक – आध दवा न मिले तो कोई हर्ज नहीं हैं परन्तु कीकर छाल ज़रूरी हैं । काढ़े से मुँह व खुरों को प्रतिदिन पिचकारी या प्रेशर से धोए तो अच्छा रहेगा । 

कीटाणु नाशक औषधियाँ — 
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पशु के खुरों में कोई लेप या मरहम आदि लगाने से पहले यह देख लेना चाहिए कि घाव व खुरों में कीड़े तो नहीं पड़ गये हैं यदि ऐसा है तो कीटाणु नाशक दवा लगाकर दवा लगाकर उनके मर जाने पर दवा- मरहम लगाकर पट्टी बाँधनी चाहिए – 

१ – औषधि – फिनाइल का फोहा बाँधे या फिनायल से पानी में मिलाकर उससे पैर धोये । 

२ – औषधि -मैथिलेटिड स्प्रिट भी उत्तम कीटाणु नाशक है साथ ही घावों को भी भरती हैं । दवा को खुरों के बीच तक पहुचानी चाहिए । 

३ – औषधि – मुँह तथा थन आदि में उपर्युक्त दवा का प्रयोग नहीं किया जाता हैं इसके स्थान पर लाल दवा के घोल से धोना चाहिए । 

४ – औषधि – जामुन तथा अनार की छाल १-१ पाँव तथा एक पाँव कीकर के पत्ते या छाल ४ लीटर पानी में डालकर पकायें । जब एक चौथाई पानी शेष रहने पर छानकर ठन्डा होने पर उससे पशु के मुँह , थन एवं खुरों को धोयें । यह दवा भी उत्तम कीटाणु नाशक हैं । 


५ – औषधि – यदि खुरों के पास पैरों में माँस बढ़ जायें तो उस पर तुतिया रगड़ना सर्वोत्तम एवं लाभकारी हैं । 

६ – औषधि – यदि सुम गिर जाय तो तुतिया १ भाग , फिटकरी २ भाग और कोयला ४ भाग – सभी को बारीक पावडर करके कपडछान कर मिलाकर घाव पर बुरक देना चाहिए । और पट्टी बाँध देनी चाहिए । यह । अत्यन्त लाभकारी उपाय हैं । 

# – खूरपका ( ज्वरनाशक ) औषधियाँ – 
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खूरपका बुखार को झाड़ने का मन्त्र व विधी इस प्रकार हैं — 

गंग जमुन दो बहे सरस्वती , गऊ चरावै गोरखयती ।। 
गोरखयती की बाचा फुरी , नामहुँ फूटे न आव खुरी ।। 
जारा मारा माँद विसहरी, बडुका वौडी डिमरारूज जारी ।। 
भस्म खुरखुट दोहाई नोना चमारी की आन ।। 
मेरी भक्ति – गुरू की शक्ति , फुरो मन्त्र ईश्वरवरो वाचा ।। 

नीम की हरी पत्तियों वाली टहनी से ५ बार मन्त्र पढ़कर पशु को झाड़ना चाहिए पशु का बुखार ठीक होता हैं । 

# – इस खूरपका रोग में पशु को तेज़ बुखार हो जाता हैं और बुखार के कारण उसके घाव भी जल्दी नहीं भरते हैं । और नहीं पशु कुछ खा – पी सकता हैं इसलिए सबसे पहले बुखार उतारने की कोशिश करनी चाहिए । कुछ ज्वरनाशक योग इस प्रकार है — 

१ – औषधि – कपूर ९ माशा , कलमीशोरा १ तौला , देशीशराब ढाई तौला और पानी सवा लीटर लें । पहले कपूर को शराब में अच्छी तरह मिला लें और शीरे को पानी में घोल लें । फिर इन दोनों घोलों को परस्पर मिलाकर थोड़ी – थोड़ी मात्रा में पशु को पिलायें । 

२ – औषधि – बबूल व सिरस की छाल ५-५ तौला , हराकसीस ३ माशा , नीम के फूल और चिरायता ५-५ तौला , पीले – फूलों वाली कटेरी ५ तौला और पानी ५ लीटर लें । हराकसीस उसमें घोल दें । इनका काढ़ा थोड़ा- थोड़ा करके गुनगुना – गुनगुना ही पशु को पिलायें । यह काढ़ा बुखार की तेज़ी को कम करता हैं । इस काढ़े से पशु के थन व मुँह को धोना भी लाभकारी होता हैं । 

सस्ते में घी खाने वाले जान लीजिये

सस्ते में घी खाने वाले जान लीजिये आप क्या खा रहे हैं और कैसे बीमारियों को आमंत्रित कर रहे हैं?
आपलोगों में से कई लोग इस फर्क को जानते भी होंगे।
घी हो या butter आयल दोनो ही दूध से तैयार होता है। बस दोनों के प्रोसेसिंग में अंतर होता है।
Butter ऑयल:- कच्चे दूध से मशीनों द्वारा क्रीम निकाला जाता है और उस क्रीम को गर्म किया जाता है जिसे butter ऑयल कहते हैं। इसकी प्रोसेसिंग सस्ती होती है, जिससे कंपनियों को ज्यादा मुनाफा होता है। अब कंपनियां इस butter ऑयल को बेचने के लिए इसे घी के रूप में प्रमोट करती हैं। जो आपको आसानी से Rs 500 से Rs 700 के रेंज में मिल जाती है।
घी:- घी बनाने के लिए दूध जमाते हैं जिससे दही बनता है फिर उस दही को मथनी से मथा जाता हैं जिससे माखन और छांछ(मठ्ठा) मिलता है। इस विधि से प्राप्त माखन को गर्म करके घी तैयार किया जाता है।
इस तरीके से तैयार घी की कॉस्टिंग दूध के मूल्य के हिसाब से कर सकते हैं।
1 लीटर घी तैयार करने के लिए लगभग 30 लीटर दूध की जरूरत होती है। अब आप अपने मार्केट में उपलब्ध दूध की कीमत से घी तैयार करने का खर्च जोड़ लीजिये।
इसमें घी तैयार करने वाले के मेहनत को नही जोड़ा है।
अब आप अंदाजा लगाइये की आपको इतना सस्ता घी कैसे मिल जाता है। यही कारण है की आज लोग घी के नाम पर butter आयल खा रहे हैं।
अब आपके मन में एक प्रश्न और भी उठ सकता है की दोनो तो दूध से ही बन रहा है तो शरीर में इसका क्या नुकसान है।
Butter आयल और घी के प्रोसेसिंग के कारण इसके गुणधर्म बदल जाते हैं।
स्वास्थ्य की दृष्टि से:- यदि आप butter ऑयल का सेवन करते हैं तो भविष्य में आपको हार्ट अटैक, डायबिटीज, सर्वाइकल, जॉइंट पेन तथा और भी अनेकों बीमारियां होगीं और हो भी रही है। क्योंकि butter आयल खाने से शरीर में खराब cholestrol (LDL, VLDL) बनता है जो बीमारियों का कारण है।
वही आप सही तरीके से बनाए गए घी का प्रयोग करते हैं तो शरीर में अच्छा कोलेस्ट्रॉल (HDL) बनता है, यह शरीर को गंभीर बीमारियों से बचाता है। यदि आप घी खाते हैं और दिन में कम से कम 2 घंटे शारीरिक श्रम करते हैं जिससे आपके शरीर से पसीना निकलता है तो आप कई गंभीर बीमारियों से बचे रहेंगे।
अपने घर में इस प्रयोग को करके देखें, तब आपको घी का वास्तविक कीमत पता चलेगा।

Wednesday, 19 September 2018

परोपकार भी करते हैं तो अपना ही यश चाहते हैं

विचार == विवेक
आजकल आपने देखा होगा कि मंदिरों और मस्जिदों में बहुत चढ़ावा चढ़ाया जा रहा है । दर्शनों के लिए स्त्री पुरुषों की इतनी भीड़ दिखाई देती है कि लगता है सारा संसार भगवान का भक्त हो गया है ।

ईसाई समुदाय के चर्च में ईसाइयों की भीड़, मंदिरों में हिंदुओं की भीड़, तथा मस्जिदों में मुसलमानों की भीड़ दिखाई दे रही है ।

सभी स्त्रियां और सभी पुरुष अपने अपने धर्म और भगवान के बड़े भक्त दिखाई दे रहे हैं । ऐसा कोई न तो पुरुष दिखाई देता है जो किसी न किसी धर्म से और अपने अपने देवता से न जुड़ा हुआ हो और न ही कोई स्त्री ऐसी दिखाई देती है जो किसी न किसी धर्म और देवता से न जुड़ी हो ।

सभी लोग अपने अपने धर्माचार्यों से भी जुड़े हुए हैं ।सभी लोग अपने अपने तीर्थों में जाते हैं । इतना सबकुछ होते हुए भी किसी भी स्त्री और पुरुष से मिलो ,वही दुख और धोखे की बात बताता है

सभी क्रूर, धोखेबाज, और स्वार्थी ही दिखाई देते हैं । इन धार्मिकों का आचरण और जीवनशैली ऐसी है कि जैसे घोर कामी और घोर लोभी की होती है । 

आज की स्त्री और पुरुष किसी भी धर्म के हों, वास्तव में वे न तो धार्मिक हैं और न ही भक्त हैं । तो फिर ये क्या हैं ?

 इसका उत्तर प्रह्लाद जी ने नृसिंह भगवान से कहा कि हमारे पिता जी ने तपस्या भी की,  अपने भगवान का दर्शन भी किया, उनसे बात भी की,  और उनसे वरदान भी प्राप्त किया ।

लेकिन उनका न तो मन शुद्ध हुआ और न ही आचरण में परिवर्तन हुआ ।

इतनी क्रूरता तथा दूसरों को दुखी करने की प्रवृत्ति और निर्बलों को मारकर सम्पत्ति इकट्ठे करने की वृत्ति और आचरण देखकर लगता है कि ऐसे लोग को न तो धार्मिक होते हैं और न ही भगवान के भक्त होते हैं । ये दुष्ट मन के ही होते हैं ।

भागवत के 7 वें स्कन्ध के 10 वें अध्याय के चौथे श्लोक में प्रह्लाद जी ने भगवान से कहा है ।

" नान्यथा तेsखिलगुरो घटेत करुणात्मनः ।
यस्ते आशिश आशास्ते न स भृत्यः स वै वणिक् ।।

प्रह्लाद जी ने कहा कि हे भगवन् ! हे अखिलगुरो ! आप तो करुणा के सागर हैं ।आप अपने भक्त को माया में नहीं फंसाना चाहते हैं । जो भी आपकी सेवा पूजा अर्चना करके आप से अपनी कामना पूर्ति करवाना चाहते हैं ,वे आपके भक्त नहीं हैं ।वे तो वणिक् (बनिया ,व्यापारी ) हैं ।

जैसे बनिया व्यापारी मीठी मीठी बातें करके अपने ग्राहक को प्रसन्न करके अपने सामान को बेचना चाहता है ।न तो वणिक को ग्राहक से प्रेम होता है और न ही वणिक को ग्राहक के दुख से मतलब होता है ।

उधार न चुकाने पर यही वणिक उसी ग्राहक का अपमान भी करता है और उसका घर द्वार, गहने आभूषण सब खा जाता है ।

अर्थात जैसे व्यापारी के मन में कुछ और होता है और वर्तमान के आचरण में कुछ और ही होता है ।उसी प्रकार जिनके मन में कामनाएं होतीं हैं ।उनकी पूर्ति के लिए फूल, माला, दूर्वा ,नारियल ,रुपया आदि भेंट करके मंत्र जप आदि करते हैं ,वह सब बनियागिरी है।

मन में कुछ और आचरण में कुछ और होता है। उन्हें आप से प्रेम नहीं होता है ,और न ही उनके हृदय में भक्ति होती है । ऐसे लोग भगवान से थोड़ी पूजा अर्चना करके ,थोड़ा कुछ रुपया चढ़ाकर के उससे हजारों गुना भगवान से लेना चाहते हैं।

आजकल इसलिए सभी हिरण्यकशिपु की तरह ही आचरण के भक्त हैं। तपस्या, व्रत, पूजा आदि देखकर तो ऐसा ही लगता है कि यह आस्तिक, धार्मिक सज्जन आदमी है। लेकिन जैसे ही मौका मिलता है, वह अपना स्वभाव दिखा ही देते हैं।

धोखा, व्यभिचार, अत्याचार ही इनके मन में है। लेकिन अवसर नहीं मिलता है ।इस दृष्टि से मंदिरों में करोड़ों का मुकुट हार चढ़ानेवाले भक्त नहीं हैं। वणिक हैं, व्यापारी हैं।

एक करोड़ का मुकुट चढ़ाकर भगवान से 100करोड़ चाहते हैं। पंडित, पुजारी, मंडलेश्वर, सभी तो ऐसे ही वणिक हैं।  परोपकार भी करते हैं तो अपना ही यश चाहते हैं। 

कोई भगवान का विरक्त भक्त आता है तो मंडलेश्वर दर्शन नहीं देते हैं। लेकिन कोई धनवान आता है तो उसकी सेवा करने में ही लग जाते हैं क्योंकि इन्हें भगवान की भक्ति नहीं चाहिए। भगवान की शक्ति चाहिए।

इसलिए महापुरुष तथा शास्त्र कहते हैं कि न मांगने से भगवान प्रसन्न हो जाते हैं। जब भगवान प्रसन्न हो जाते हैं तो फिर किसी से कुछ मांगने की जरूरत नहीं रहती है।

इन व्यापारी धार्मिकों से बचते रहे, तो एक न एकदिन संत भगवान अवश्य ही मिल जाएंगे। फिर क्या है, वो मिले तो वे मिल ही जाएंगे।

आचार्य ब्रजपाल शुक्ल, वृन्दाबन धाम

गौ मूत्र फिनायल बनाने की विधि (केमिकल रहित)

             *सामग्री* गौ मूत्र      *एक लीटर* नीम पत्र    *200 ग्राम सूखा* पाइन आयल इमल्सीफायर युक्त     *50 ग्राम* उबाला हुआ पा...