Sunday, 30 September 2018

गाय के बाईं तरफ से प्रणाम करते हुए ही निकलना चाहिए


प्रश्न == नारायणकवच में कहा गया है कि
 " मार्ग में देवहेलना रूप दोष से हयशीर्ष भगवान हमारी रक्षा करें " ये देवहेलना क्या है ?
चिंतल विजय भाई दवे ,बड़ोदरा ,गुजरात ।

उत्तर == यह नारायणकवच भागवत के छठवें स्कन्ध के 8 वें अध्याय में है । देवता भी दुष्टों के अत्याचार से दुखी होकर स्तोत्रों द्वारा भगवान के विविध अवतारों की स्तुति करते हैं । 

यह नारायणकवच दैत्यों के पुरोहित त्वष्टा के पुत्र विश्वरूप ने भगवान इन्द्र को प्रदान किया था ।
अर्थात भगवान पक्षपाती नहीं हैं ।

यदि दैत्य भी और दैत्यों के पक्षपाती गुरू भी भगवान से आत्मरक्षा की प्रार्थना करते हैं तो भगवान उनकी भी रक्षा करते हैं ।
 भगवान तो माँ के समान होते हैं । विषमता तो पुत्रों में होती है ,माँ के हृदय में असमानता ,विषमता , स्वार्थ और पक्षपात नहीं होता है । इसीलिए तो माता पिता को भगवान कहा जाता है ,तथा भगवान को "त्वमेव माता च पिता " कहा जाता है ।

अब आप अपने प्रश्नानुकूल उत्तर सुनिए । नारायणकवच के 15 वें श्लोक में भगवान से रक्षा के लिए प्रार्थना की गई है ।

 सनत्कुमारोsतु कामदेवात् हयशीर्षा मां पथि देवहेलनात् "

जिस समय पति पत्नी के लिए संयोग करने के लिए निषेध किया गया है ,उस समय जगनेवाले कामदेव से तथा अन्य स्त्री को देखकर पुरुष के  हृदय में जगनेवाले कामदेव से तथा सुंदर पुरुष को देखकर स्त्री के हृदय में जगनेवाले कामदेव से ब्रह्मापुत्र सनत्कुमार हमारी रक्षा करें । तथा मार्ग में जाते हुए प्रतिष्ठित अप्रतिष्ठित देवताओं को नमस्कार न कर पाने से जो दोष लगता है ,तथा कुपित देवताओं से हयग्रीव भगवान हमारी रक्षा करें ।

 महाकवि कालीदास जी ने रघुवंश महाकाव्य में लिखा है कि राजा दिलीप ने गुरुवसिष्ठ जी से संतान न होने का कारण पूंछा तो गुरुदेव ने बताया कि "जब आप स्वर्ग से आ रहे थे तो मार्ग में कामधेनु खड़ी थी । आपने उसे प्रणाम भी नहीं किया था और न ही उसे दाहिने तरफ करके चले थे ।उसी दोष के कारण आपके संतान सुख नहीं मिल रहा है ।

अर्थात गाय के बाईं तरफ से प्रणाम करते हुए ही निकलना चाहिए । सूर्य की ओर ,पीपल की ओर मुख करके न तो थूंकना चाहिए और न ही मल मूत्र करना चाहिए । ब्राह्मण ,गौ, सूर्य ,पीपल , ये अप्रतिष्ठित देवता हैं ।ये सर्वत्र और सदा ही प्राप्त होते हैं । इनको प्रणाम करते हुए ही आगे बढ़ना चाहिए । यही देवहेलना कही जाती है ।

यदि इनको प्रणाम किए बिना ही निकल जाते हैं तो अवहेलना कहलाएगी ।जैसे आप कहीं बैठे हों या खड़े हों और आप से परिचित व्यक्ति आपको देखकर भी या बिना देखे ही  बिना बोले ही समीप से निकल जाता है तो आपके मन में कुछ न कुछ अनादर का भाव जगने लगता है ।इसी को उपेक्षा और अवहेलना कहते हैं ।

इसलिए प्रार्थना की गई है कि मार्ग में शीघ्रता के कारण या किसी विचार के कारण मार्ग में देवमंदिर ,गौ ,ब्राह्मण  ,संत या हमसे श्रेष्ठ पुरुषों की अवमानना  जाने अनजाने हुई हो ,तो उनके क्रोध से हयग्रीव भगवान हमारी रक्षा करें । इसलिए कोई न कोई स्तोत्र पाठ प्रतिदिन करना चाहिए । संसार का कितना भी बलवान धनवान प्रभावशाली मनुष्य हो ,वह दैवी आपत्ति से आपकी रक्षा नहीं कर सकता है ।आपका धर्म ही आपकी रक्षा करता है ।
राधे राधे ।
-आचार्य ब्रजपाल शुक्ल, श्री धाम वृन्दाबन

Saturday, 29 September 2018

नैनों टेक्नालॉजी का प्राचीन विज्ञान@हवन

पदार्थ की समाप्ति केवल ब्लैक होल में होती है,इसके पहले वह केवल टूटता है।
पार्टिकल केवल नैनो होता है।
और मैंने आपको अपने प्रशिक्षणो में विस्तार से बताया है कि पदार्थ जैसे जैसे नैनो होता है वह अधिक पॉवरफुल और परफेक्ट हो जाता है।
पदार्थ नैनो में कैसे आता है समझे
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पेड़ की लकड़ी टूटकर छोटा टुकड़ा होता है यह टुकड़ा टूटकर कणों में,कण अणुओं में,अणु परमाणुओं में,परमाणु टूटकर इलेक्ट्रॉन, प्रोट्रान,न्यूट्रॉन में और ये टूटकर एनर्जी में कन्वर्ट होते है,
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लकड़ी के एक चने के बराबर टुकड़े में या पानी के एक बूंद में 20 tnt (टी एन टी) की ऊर्जा निकलती है और हिरोशिमा में जो एटम बम गिराया गया था वह 15 tnt(टी एन टी) की थी।
सोचिए पानी की एक बूंद में कितनी ऊर्जा होती है।
और ये ऊर्जा का हमे एहसास होता है क्या,
कत्तई नही।
क्यो
ये ऊर्जा पदार्थ में बंधी है,पदार्थ के अंदर है,
इसे निकालने के लिए हमे पदार्थ को तोड़ना पड़ेगा।
जैसे जैसे पदार्थ टूटेगा वैसे वैसे ऊर्जा निकलती है
और पूर्ण ऊर्जा 20tnt पदार्थ के पूर्ण टूटने से निकलती है।
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होमियोपैथी वाले पदार्थ को पानी के माध्यम से तोड़ते है।
10 ml आसुत जल(डिस्टिल्ड वाटर) में 1 ml नींबू रस को मिलाकर 100 बार हिलाते है।
नींबू का रस 1/100 हो जाता है,इसमे से फिर 1 ml निकालकर पुनः 100 ml आसुत जल में डालकर 100 बार हिलाते है,
रस 1/1000 हो जाता है,ऐसा करते करते रस 1/दस हजार,फिर 1/1 लाख,फिर 10 लाख फिर 1 करोङ और 1 अरब बार तोड़ा,
1 अरब आते ही पदार्थ नैनो पार्टिकल में हो जाता है।
होमियोपैथी वाले इसे जल में डालकर 9 बार में तोड़ते है,
मैंने इसे अग्नि में डालकर तोड़कर उपयोग करने का प्रयास किया है।
यह परम्परा हमारे ऋषियोँ ने हजारो वर्ष पूर्व ही शुरू करवा दिया है।
आम बोलचाल में इसे हवन कहते है।
मैंने इसे ही गन्ध चिकित्सा कहा है।
गन्ध चिकित्सा के अनुप्रयोग सबसे पहले मैंने अपने 17 से 20 अप्रेल 2017 भोपाल के अपने प्रशिक्षण में बताया था,तब से सभी प्रशिक्षणो में बता रहा हूँ, फसल उत्पादन,पशु स्वस्थ्य,दुग्ध उत्पादन, मानव स्वास्थ्य आदि में प्रत्यक्ष अनेक प्रयोग भी करवाये है।
उसमे 8 घण्टे में सर्दी ठीक करने का अपना प्रयोग सर्वकालिक सिद्ध हुआ है।
ऐसे ही
कुछ रोगों के सन्दर्भ में नीचे दिए उपायों को भी बता रहा हूँ👇
आप अग्निहोत्र पात्र जैसे आकार के पात्र में गाय के गोबर के कण्डे जलाएं,पहले चार बून्द गाय का घी निम्न चार मंत्र(वेब्स निर्माण की प्रक्रिया) पूर्ण करके निम्न बीमारियों में निम्न औषधीय का हवन करके अनुलोम विलोम करें।
चार मन्त्र है👇
भू: स्वाहा,अग्नये इदं न मम
भूवःस्वाहा,वायवे इदं न मम
स्व: स्वाहा,सूर्याय इदं न मम
भूर्भुवःस्व:स्वाहा,प्रजापतये इदं न मम
ये चार बून्द घी हवन करने की प्रक्रिया को मंगल हवन भी कहा जाता है।
मानव हो या पशु या फसलों को स्वस्थ्य करना हो तो यह शुरू में यह मंगल हवन अवश्य करना है।
घी की इन चार आहुति के होते ही वातावरण कण्डे व घी के जलने के संयोजन के निकले हुए अनुकूल वायु एथिलीन ऑक्साइड, प्रोपलीन ओक्साइड,फार्मेल्डिहाइड से भर जाता है।
मैंने आपको बताया ही है कि वायु को अनुकूल करने का काम गाय का घी ही करता है।
*सुगन्धिम पुष्टि वर्धनम*
इन चार आहुति से सुक्ष्म पदार्थ प्राप्त करने का वातावरण तैयार हो जाता है।
अब आपको निम्न औषधियां हवन पात्र में 8 मिनट में 4 बार में डालकर अनुलोम विलोम (पहले नाक से श्वांस लेना व दूसरे से छोड़ना फिर दूसरे से लेना और पहले से छोड़ना) है।
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ऐसा
दिन में कम से कम 3 बार सुबह दोपहर रात्रि में करना है।
अन्य चिकित्सा की तरह ही गन्ध चिकित्सा भी व्यक्तिगत होता है,रात्रि में सोने के पहले अपने शयनकक्ष (बेडरूम) में करें।
मानवीय बीमारियां और और उनके निदान निम्नवत है👇
 *कुपोषण* - जौ,सरसो,नारियल गिरी बुरादा,अपामार्ग की जड़ घी में मिलाकर सम्भाग हवन करें।
 *पूर्ण निद्रा*- जौ और घी मिलाकर 4 हवन करके अनुलोम विलोम करे फिर अगर,तगर,चन्दन,नागरमोथा,दालचीनी का आधी चम्मच चूर्ण तेजपान के टुकड़े हवन पात्र में डालकर धीमा धुँआ होने दे।
रात्रि बहुत बढ़िया नींद आएगी।
 *भूख न लगना*- पीली सरसों के बीज का हवन
 *टाइफाईड* – चिरायता, पितपापडा, त्रिफला सम्भाग शुद्ध गौ घृत मिश्रित आहुति दें
 *ज्वरनाशक* – अजवाइन की आहुति हवन में दें
*सिरदर्द* – मुनक्का की आहुति हवन में दें
 *नेत्रज्योति वर्धक* – शहद और सहिजन(मुनगा) बीज की आहुति हवन में दें
*मस्तिष्क बलवर्धक* - ब्राम्ही,शंखपुष्पी,सफ़ेद चन्दन की आहुति दें
*वातरोग नाशक* – त्रिफला,पिप्पली की आहुति दें,
*मनोविकार नाशक* – गुग्गल और अपामार्ग की आहुति दें
*मानसिक उन्माद नाशक* – जटामासी चूर्ण की आहुति दें
*पीलिया नाशक* – देवदारु, भूमि आंवला पंचांग, नागरमोथा, कुटकी और वायविडग्ग की आहुति दें
*मधुमेह नाशक* – गुग्गल,जामुन की गुठली या वृक्ष की छाल का चूर्ण,गुड़मार और करेला के डंठल संभाग की आहुति दें ।
 *प्रदर रोग*- छुई मुई पंचांग, अशोक की छाल, बच की जड़ का हवन
*मलेरिया नाशक* – गुग्गल,कचूर,दारुहल्दी, अगर,तगर, वायविडग्ग, जटामासी, वच, देवदारु, अजवाइन, चिरायता समभाग चूर्ण की आहुति दें
 *जोड़ों का दर्द* – निर्गुन्डी के पत्ते, गुग्गल, सफ़ेद सरसों और राल संभाग चूर्ण की आहुति दें
*निमोनिया नाशक* – वच मूल, गुग्गल,हल्दी,हींग और अडूसा संभाग चूर्ण की आहुति दें
 *जुकाम नाशक* – खुरासानी अजवाइन, जटामासी, हल्दी संभाग चूर्ण की आहुति दें
*कफ नाशक* –हल्दी चूर्ण, वच मूल, अडूसा पत्र सम्भाग चूर्ण की आहुति दें।
*शीत पित्त नाशक*- दारुहल्दी और हरण का सम्भाग हवन करें।
सामान्यतः जिन औषधियों को आयुर्वेद का डॉक्टर खाने के लिए देता है उनका हवन करना है।
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*पशुपालन में गन्ध चिकित्सा*
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👉पशुओं में दुग्ध उत्पादन बढ़ाने के लिए कुपोषण दूर करने वाले उक्त योग का चार बार हवन करें।
फिर सुगन्धित द्रव्य (अगर,तगर,चन्दन,नागरमोथा,दालचीनी का मिश्रण आधी चम्मच) डालकर गन्ध होने दें।
👉पशुशाला को फंगस बैक्टीरिया से बचाने के लिए समय समय पर हींग,गुगल, राल बच की जड़ का हवन करते रहे।
👉 मानवीय बीमारियों के लक्षण यदि पशुओं में दिखे तो जिन औषधियों का वर्णन किया गया है उनकी मात्रा बढ़ाकर गौशाला या पशुशाला में हवन करे।
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*फसल स्वस्थ्य में गन्ध चिकित्सा*
*पौध पोषण* - जौ और तिल या सरसो या अलसी या किसी भी तिलहन की खली मिलाकर हवन करें।
*पौधों में फूल बढ़ाने के लिए* आंकड़ा(मदार),पलास(टेशू) व महुआ के फूलों में शहद मिलाकर चुपड़कर हवन करें।
फूल आते समय पौधों के नीचे हवन करें या पौधों की लाइन में हवन करते जाएं चलते जाएं।
👉फसल को फंगस/वायरस से बचाने के लिए आप हवन पात्र में गुगल या हींग,राल या लोभान, हल्दी,सोंठ चूर्ण समभाग लेकर हवन करते जाएं व पौधों की ओर गन्ध करते जाएं।
👉 फसल को कीटों से बचाने के लिए बच की जड़,चिरायता,निम्बोली चूर्ण मिलाकर हवन करें।

अरे मोदी ने यह क्या किया............???

“जैसे कि आँवला है, हनी है, और फिर एलो वेरा है, तो वो तो हम घर में भी यूज़ करते ही हैं” 

कोलगेट का ‘स्वर्ण वेदशक्ति’ नामक टूथपेस्ट का एड आता है टीवी पर, जिसमें एक मुम्बई में रहने वाले गुजराती सा एक्सेंट लिए एक औरत उपरोक्त वाक्य बोलती हैं।

कोलगेट वेदशक्ति, कोलगेट का एक आयुर्वेदिक प्रोडक्ट है, जो दूसरे ही टूथपेस्ट में लगने वाले केमिकल्स के बजाय प्राकृतिक पदार्थ से बना है।

आज से कुछ साल पहले कोलगेट का ही एक एड आता था, जिसमें फिल्म अभिनेता सुनील शेट्टी एक चश्मे के एक ग्लास पर कोलगेट का पाउडर रगड़ता है, और दूसरे पर काला दंत मंजन (जो बजाज सेवाश्रम का प्रोडक्ट था और है भी, और ग्रामीण भारत में बहुत चलता था)।

काले मंजन वाले कांच पर स्क्रेच आ जाते हैं, और सुनील शेट्टी समझाता है कि सोचिए, आपके दाँतो की क्या हालत होती होगी। और इस तरह से कोलगेट देशी प्रोडक्ट से बेहतर है, समझाया जाता था।

वैसे मैं बाबा रामदेव का कोई समर्थक नहीं, और ना ही मुझे उनके कोई भी प्रोडक्ट विशेष पसंद। 

पर ‘दंतकान्ति’ ने जो कोहराम मचाया था, उसके कारण कोलगेट, हिंदुस्तान लीवर जैसे बड़े खिलाड़ियों को दाँत रगड़ने के लिए आयुर्वेदिक टूथपेस्ट निकालने पड़े, और जोर जोर से चिल्लाना पड़ा, ‘इसमें आंवला है, हनी है, एलो वेरा है’।

वही सब, जो पहले भारतीयों के नीम दातुन, काले मंजन, नमक सरसों के मिश्रण से दांत साफ करने पर उपहास का पात्र बनाने और हीन भावना से भरने में भरसक प्रयास करते रहे।

ख़बर है कि अमेठी उर्फ ’15 साल में सिंगापुर’ नामक ज़िले के सांसद ’15 साल में सिंगापुर’ ज़िले के किसी शिवमंदिर में पहली बार गए। वैसे जनेऊधारी शिवभक्त आजकल किसी शिव मंदिर को नहीं छोड़ते।

“मैंने कारसेवकों पर गोली चलवाई” – कहने वाले मुलायम के बेटे दुनिया का सबसे बड़ा विष्णु मंदिर बनवाने का आह्वान करते हैं।

दुर्गा मूर्ति विसर्जन रुकवाकर मुहर्रम के ताज़िये निकालने का आदेश देने वाली ममता बनर्जी अब दुर्गा पांडालों को 28 करोड़ दे रही है।

जो इफ़्तारों में कंधों पर अरबी रुमाल डाले रूहअफज़ा पीते पाए जाते थे, वो अब मंदिरों में आरतियां करते नहीं थक रहे हैं।

मोदी ने क्या क्या किया होगा, सब कुछ पब्लिक डोमेन में उपलब्ध है, पर इस देश के हिंदुओं को जो आवाज़ मिली है, मैं इसके लिए उन्हें बार बार धन्यवाद देता हूँ।

अपने ही देश में 70 साल एक दोयम दर्जे का नागरिक बने रहने के बाद जब उसे ये याद आया कि वो जाति छोड़कर हिन्दू बनकर वोट डालेगा, तो 2011 में साम्प्रदायिक हिंसा बिल लाकर हिन्दू को तोड़ने वाले आज मंदिरों में माथे टिका टिका कर प्याज़ पेट्रोल के भूखे हिंदुओं को रिझा रहे हैं।
हिन्दू असली आयुर्वेदिक दन्तमंजन के बारे में जल्दी समझ लें तो अच्छा है, बाकी ‘आँवला हैं, हनी है, और फिर एलो वेरा भी हैं’।

Wednesday, 26 September 2018

डेंगू मच्छर, कीटनाशक से भी नहीं मरता

डेंगू से निपटने के लिए न तो प्रभावी दवाएं हैं और न ही अभी इसे नियंत्रित करने के लिए टीकाकरण उपलब्ध है। डेंगू का नियंत्रण संक्रमण फैलाने वाले मच्छरों की रोकथाम पर निर्भर करता है। इसके लिए मच्छरों को मारने वाले कई तरह के सिंथेटिक कीटनाशकों का प्रयोग किया जाता है। भारतीय वैज्ञानिकों के एक ताजा अध्ययन में पता चला है कि इन कीटनाशकों के प्रति मच्छरों में प्रतिरोधक क्षमता विकसित होने के कारण अब वे बेअसर साबित हो रहे हैं। 

दार्जिलिंग स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ नार्थ बंगाल के प्राणी विज्ञान विभाग के वैज्ञानिक पश्चिम बंगाल के डेंगू प्रभावित क्षेत्रों में कीटनाशकों के प्रति मच्छरों की प्रतिरोधक क्षमता का अध्ययन करने के बाद इस नतीजे पर पहुंचे हैं। डेंगू मच्छर मुख्य रूप से डीडीटी, मैलाथिओन परमेथ्रिन और प्रोपोक्सर नामक कीटनाशकों के प्रति प्रतिरोधी पाए गए हैं। अधिकांश डेंगू मच्छरों में टेमेफोस, डेल्टामेथ्रिन और लैम्ब्डासाइहेलोथ्रिन दवाओं के प्रति प्रतिरोधी लक्षण भी देखे गए हैं। शोधकर्ताओं के अनुसार, विभिन्न प्रकार के कीटनाशकों के खिलाफ मच्छरों में प्रतिरोधी तंत्र विकसित होने कारण इन कीटनाशकों का कोई खास असर मच्छरों पर नहीं पड़ता है।

वैज्ञानिकों ने मच्छरों में प्रतिरोध पैदा करने वाली जैव-रासायनिक प्रक्रियाओं का पता लगाया है। उनका कहना है कि मच्छरों में मौजूद एंजाइम कार्बोक्सीलेस्टेरेसेस, ग्लूटाथिओन एस-ट्रांसफेरेसेस और साइटोक्रोम पी450 या संयुक्त रूप से काम करने वाले ऑक्सीडेसेस के माध्यम से चयापचय से उत्पन्न डिटॉक्सीफिकेशन द्वारा प्रतिरोधक क्षमता उत्पन्न हुई है।

इस शोध के दौरान पश्चिम बंगाल के अलीपुरद्वार, कूचबिहार, जलपाईगुड़ी, दार्जिलिंग और उत्तरी दीनाजपुर समेत पांच जिलों से मच्छरों के लार्वा, प्यूपा और वयस्कों को मानसून से पहले, मानसून के समय और मानसून के बाद की अवधि में एकत्रित किया गया। इन मच्छरों पर डेल्टामेथ्रिन, लैम्बडेसीहेलोथ्रिन, मैलेथिओन, प्रोपोक्सर, परमेथ्रिन और डीडीटी के प्रभाव का अध्ययन किया गया है। पृथक रूप से और मिलाकर उपयोग किए गए इन कीटनाशकों के प्रभाव से प्रति दस मिनट में मरकर गिरने वाले मच्छरों की संख्या का आकलन करते हुए उनकी मृत्यु दर की गणना की गई है।

शोधकर्ताओं ने मच्छरों की मृत्यु दर के आधार पर उनकी कीटनाशकों को ग्रहण करने की क्षमता के बीच संबंध स्थापित किया है। इससे पता चला है कि पिछले 70 वर्षों से दुनियाभर में कृषि और सार्वजनिक स्वास्थ्य क्षेत्र दोनों में व्यापक रूप से उपयोग किए जाने वाले कीटनाशक डीडीटी के प्रति मच्छरों की कीटनाशकों के प्रति प्रतिरोधक क्षमता सबसे ज्यादा है क्योंकि इसके उपयोग से सिर्फ 46 प्रतिशत से 70.2 प्रतिशत मच्छर ही नष्ट हो पाते हैं। कुछ समय पूर्व उपयोग में आए डेलटामेथ्रिन और लैम्ब्डेसीहलोथ्रिन के लिए मच्छर अति संवेदनशील थे या फिर उनके लिए उनमें धीमी गति से प्रतिरोध देखा गया है। इसीलिए मच्छरों की मृत्यु दर 100 प्रतिशत के करीब थी। हांलाकि, प्रतिरोधक क्षमता विकसित होने से मच्छरों की सभी कीटनाशकों के प्रति संवेदनशीलता बहुत कम हो गई है।
 
इस अध्ययन से जुड़े वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. धीरज साहा ने बताया कि “भारत में डेंगू की रोकथाम और नियंत्रण एकीकृत रोगवाहक प्रबंधन के माध्यम से की जाती है। इनमें सार्वजनिक तौर पर बड़े पैमाने पर कीटनाशकों का प्रयोग, लार्वाइसाइड्स और लार्वा खाने वाली मछलियों का उपयोग, दो प्रतिशत पाइरेथ्रम या पांच प्रतिशत मैलेथिओन के नियमित छिड़काव जैसी युक्तियां अपनायी जाती हैं। निजी स्तर पर घरों में भी लोग कई तरह के मच्छर नियंत्रण पाइरेथ्रॉइड समूह वाले कीटनाशकों का उपयोग कर रहे हैं। कीटनाशकों के अंधाधुंध उपयोग के कारण मच्छरों ने अपने शरीर में कीटनाशकों के नियोजित कार्यों का प्रतिरोध करने के लिए रणनीतियों का विकास कर किया है। इसी प्रक्रिया को कीटनाशकों के प्रति प्रतिरोधी क्षमता के विकास रूप में जाना जाता है।”

एडीस एजिप्टि और एडीस अल्बोपिक्टस डेंगू के रोगवाहक मच्छरों की प्रजातियां हैं, जो पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में फैली हैं। हर साल भारत में डेंगू के लाखों मामले सामने आते हैं। मच्छरों को मारने और खेतों में छिड़काव किए जाने वाले कीटनाशकों के प्रति मच्छरों में प्रतिरोधक क्षमता विकसित होने के कारण पूरी दुनिया में चलाए जा रहे रोगवाहक नियंत्रण कार्यक्रमों में काफी परेशानियां पैदा हो रही हैं। 

शोधकर्ताओं के अनुसार, मच्छरों में कीटनाशक प्रतिरोधी स्तर के मूल्यांकन से डेंगू जैसी बीमारियों को न्यूनतम स्तर तक सीमित किया जा सकता है। कुशल एकीकृत वेक्टर नियंत्रण रणनीतियों को डिजाइन करने में इस अध्ययन के निष्कर्ष उपयोगी हो सकते हैं। जीन स्तर पर केंद्रित उन्नत अध्ययन भी प्रतिरोध के बारे में विस्तृत जानकारी प्राप्त करने में मदद कर सकती है। शोधकर्ताओं की टीम में डॉ. धीरज साहा के के अलावा मीनू भारती भी शामिल हैं। यह शोध प्लॉस वन शोध पत्रिका में प्रकाशित किया गया है। (इंडिया साइंस वायर)

Tuesday, 25 September 2018

गौमूत्र किस समय नहीं लें?

1. किस समय पर दूध से दही बनाने की प्रक्रिया शुरू करें?
रात्री में दूध को दही बनने के लिए रखना सर्वश्रेष्ठ होता है ताकि दही एवं उससे बना मट्ठा, तक्र एवं छाछ सुबह सही समय पर मिल सके|
2. गौमूत्र किस समय पर लें?
गौमूत्र लेने का श्रेष्ठ समय प्रातःकाल का होता है और इसे पेट साफ करने के बाद खाली पेट लेना चाहिए| गौमूत्र सेवन के 1 घंटे पश्चात ही भोजन करना चाहिए|
3. गौमूत्र किस समय नहीं लें?
मांसाहारी व्यक्ति को गौमूत्र नहीं लेना चाहिए| गौमूत्र लेने के 15 दिन पहले मांसाहार का त्याग कर देना चाहिए| पित्त प्रकृति वाले व्यक्ति को सीधे गौमूत्र नहीं लेना चाहिए, गौमूत्र को पानी में मिलाकर लेना चाहिए| पीलिया के रोगी को गौमूत्र नहीं लेना चाहिए| देर रात्रि में गौमूत्र नहीं लेना चाहिए| ग्रीष्म ऋतु में गौमूत्र कम मात्र में लेना चाहिए|
4. क्या गौमूत्र पानी के साथ लें?
अगर शरीर में पित्त बढ़ा हुआ है तो गौमूत्र पानी के साथ लें अथवा बिना पानी के लें|
5. अन्य पदार्थों के साथ मिलकर गौमूत्र की क्या विशेषता है? (जैसे की गुड़ और गौमूत्र आदि संयोग)
गौमूत्र किसी भी प्रकृतिक औषधी के साथ मिलकर उसके गुण-धर्म को बीस गुणा बढ़ा देता है| गौमूत्र का कई खाद्य पदार्थों के साथ अच्छा संबंध है जैसे गौमूत्र के साथ गुड़, गौमूत्र शहद के साथ आदि|
6. गाय का गौमूत्र किस-किस तिथि एवं स्थिति में वर्जित है? (जैसे अमावस्या आदि)
अमावस्या एवं एकादशी तिथि तथा सूर्य एवं चन्द्र ग्रहण वाले दिन गौमूत्र का सेवन एवं एकत्रीकरण दोनों वर्जित है|
7. वैज्ञानिक दृष्टि से गाय की परिक्रमा करने पर मानव शरीर एवं मस्तिष्क पर क्या प्रभाव एवं लाभ है?
सृष्टि के निर्माण में जो 32 मूल तत्व घटक के रूप में है वे सारे के सारे गाय के शरीर में विध्यमान है| अतः गाय की परिक्रमा करना अर्थात पूरी पृथ्वी की परिक्रमा करना है| गाय जो श्वास छोड़ती है वह वायु एंटी-वाइरस है| गाय द्वारा छोड़ी गयी श्वास से सभी अदृश्य एवं हानिकारक बैक्टेरिया मर जाते है| गाय के शरीर से सतत एक दैवीय ऊर्जा निकलती रहती है जो मनुष्य शरीर के लिए बहुत लाभकारी है| यही कारण है कि गाय की परिक्रमा करने को अति शुभ माना गया है|
8. गाय के कूबड़ की क्या विशेषता है?
गाय के कूबड़ में ब्रह्मा का निवास है| ब्रह्मा अर्थात सृष्टि के निर्माता| कूबड़ हमारी आकाश गंगा से उन सभी ऊर्जाओं को ग्रहण करती है जिनसे इस सृष्टि का निर्माण हुआ है| और इस ऊर्जा को अपने पेट में संग्रहीत भोजन के साथ मिलाकर भोजन को ऊर्जावान कर देती है| उसी भोजन का पचा हुआ अंश जिससे गोबर, गौमूत्र और दूध गव्य के रूप में बाहर निकलता है वह अमृत होता है|
9. गौमाता के खाने के लिए क्या-क्या सही भोजन है? (सूची)
हरी घास, अनाज के पौधे के सूखे तने, सप्ताह में कम से कम एक बार 100 ग्राम देसी गुड़ , सप्ताह में कम से कम एक बार 50 ग्राम सेंधा या काला नमक, दाल के छिलके, कुछ पेड़ के पत्ते जो गाय स्वयं जानती है की उसके खाने के लिए सही है, गाय को गुड़ एवं रोटी अत्यंत प्रिय है|
10. गौमाता को खाने में क्या-क्या नहीं देना है जिससे गौमाता को बीमारी ना हो? (सूची)
देसी गाय जहरीले पौधे स्वयं नहीं खाती है| गाय को बासी एवं जूठा भोजन, सड़े हुए फल नहीं देना चाहिए| गाय को रात्रि में चारा या अन्य भोजन नहीं देना चाहिए| गाय को साबुत अनाज नहीं देना चाहिए हमेशा अनाज का दलिया करके ही देना चाहिए|
11. गौमाता की पूजा करने की विधि? (कुछ लोग बोलते है कि गाय के मुख कि नहीं अपितु गाय कि पूंछ कि पूजा करनी चाहिए और अनेक भ्रांतियाँ है|)
गौमाता की पूजा करने की विधि सभी जगह भिन्न-भिन्न है और इसके बारे में कहीं भी आसानी से जाना जा सकता है| लक्ष्मी, धन, वैभव आदि कि प्राप्ति के लिए गाय के शरीर के उस भाग कि पूजा की जाती है जहां से गोबर एवं गौमूत्र प्राप्त होता है| क्योंकि वेदों में कहा गया है की “गोमय वसते लक्ष्मी” अर्थात गोबर में लक्ष्मी का वास है और “गौमूत्र धन्वन्तरी” अर्थात गौमूत्र में भगवान धन्वन्तरी का निवास है|
12. क्या गाय पालने वालों को रात में गाय को कुछ खाने देना चाहिए या नहीं?
नहीं, गाय दिन में ही अपनी आवश्यकता के अनुरूप भोजन कर लेती है| रात्रि में उसे भोजन देना स्वास्थ्य के अनुसार ठीक नहीं है|
13. दूध से दही, घी, छाछ एवं अन्य पदार्थ बनाने के आयुर्वेद अनुसार प्रक्रियाएं विस्तार से बताईए|
सर्वप्रथमड दूध को छान लेना चाहिए, इसके बाद दूध को मिट्टी की हांडी, लोहे के बर्तन या स्टील के बर्तन (ध्यान रखे की दूध को कभी भी तांबे या बिना कलाई वाले पीतल के बर्तन में गरम नहीं करें) में धीमी आंच पर गरम करना चाहिए| धीमी आंच गोबर के कंडे का हो तो बहुत ही अच्छा है| पाँच-छः घंटे तक दूध गरम होने के बाद गुन-गुना रहने पर 1 से 2 प्रतिशत छाछ या दही मिला देना चाहिए| दूध से दही जम जाने के बाद सूर्योदय के पहले दही को मथ देना चाहिए| दही मथने के बाद उसमें स्वतः मक्खन ऊपर आ जाता है| इस मक्खन को निकाल कर धीमी आंच पर पकाने से शुद्ध घी बनता है| बचे हुए मक्खन रहित दही में बिना पानी मिलाये मथने पर मट्ठा बनता है| चार गुना पानी मिलने पर तक्र बनता है और दो गुना पानी मिलने पर छाछ बनता है|
14. दूध के गुणधर्म, औषधीय उपयोग| किन-किन चीजों में दूध वर्जित है?
गाय का दूध प्राणप्रद, रक्तपित्तनाशक, पौष्टिक और रसायन है| उनमें भी काली गाय का दूध त्रिदोषनाशक, परमशक्तिवर्धक और सर्वोत्तम होता है| गाय अन्य पशुओं की अपेक्षा सत्वगुणयुक्त है और दैवी-शक्ति का केंद्रस्थान है| दैवी-शक्ति के योग से गोदुग्ध में सात्विक बल होता है| शरीर आदि की पुष्टि के साथ भोजन का पाचन भी विधिवत अर्थात सही तरीके से हो जाता है| यह कभी रोग नहीं उत्पन्न होने देता है| आयुर्वेद में विभिन्न रंग वाली गायों के दूध आदि का पृथक-पृथक गुण बताया गया है| गाय के दूध को सर्वथा छान कर ही पीना चाहिए, क्योंकि गाय के स्तन से दूध निकालते समय स्तनों पर रोम होने के कारण दुहने में घर्षण से प्रायः रोम टूट कर दूध में गिर जाते हैं| गाय के रोम के पेट में जाने पर बड़ा पाप होता है| आयुर्वेद के अनुसार किसी भी पशु का बाल पेट में चले जाने से हानि ही होती है| गाय के रोम से तो राजयक्ष्मा आदि रोग भी संभव हो सकते हैं इसलिए गाय का दूध छानकर ही पीना चाहिए| वास्तव में दूध इस मृत्युलोक का अमृत ही है|“अमृतं क्षीरभोजनम्”
15. दही के गुणधर्म, औषधीय उपयोग| किन-किन चीजों में दही वर्जित है?
दही में शीतलता है साथ में अग्नि भी है. इसलिए यह बच्चो के लिए अच्छा है. दही दाल के साथ नहीं खाना चाहिए.
16. छाछ के गुणधर्म, औषधीय उपयोग| किन-किन चीजों में छाछ वर्जित है?
छाछ में शीतलता है साथ में भरपूर मात्र में कैल्सियम भी है. यह किसी भी उम्र में ली जा सकती है. इसका सेवन वर्षा ऋतु और दोपहर के बाद में वर्जित है. लेकिन दक्सिन भारत में वर्ष भर और रात्रि में भी लिया जा सकता है.
17. श्रीखंड के गुणधर्म, औषधीय उपयोग| किन-किन चीजों में श्रीखंड वर्जित है?
श्रीखंड में मुख्यरूप से जलरहित दही, जायफल एवं देसी मिश्री होते है| जायफल कुपित हुए कफ को संतुलित करता है एवं मस्तिष्क को शीत एवं ताप दोनों से बचाता है| चूंकि श्रीखंड में जायफल के साथ जलरहित दही की घुटाई होती है इसलिए इस प्रक्रिया में जायफल का गुण 20 गुना बढ़ जाता है| इस कारण श्रीखंड मेघाशक्ति को बढ़ाता है, कफ को संतुलित रखता है एवं मस्तिष्क को शीत एवं ताप दोनों से बचाता है| अत्यधिक शीत ऋतु, अत्यधित वर्षा ऋतु में श्रीखंड का सेवन वर्जित माना गया है| ग्रीष्म ऋतु में श्रीखंड का सेवन मस्तिष्क के लिए अमृततुल्य है| श्रीखंड निर्माण के बाद 6 घंटे के अंदर सेवन कर लिया जाना चाहिए| फ्रीज़ में रखे श्रीखंड का सेवन करने से उसके गुण-धर्म बदल कर हानी उत्पन्न कर सकते है अर्थात इसे सामान्य तापमान पर रख कर ताज़ा ही सेवन करें|
18. गोबर के गुणधर्म, औषधीय उपयोग| किन-किन चीजों में गोबर वर्जित है?
गोबर अद्भुत वात नासक है.
19. गौमूत्र अर्क बनाने का बर्तन किस धातु का होना चाहिए?
मिट्टी, शीशा, लोहा या मजबूरी में स्टील|
20. गाय और बैल के सिंग को ऑइलपेंट और किसी भी तरह कि सजावट क्यों नहीं करनी चाहिए?
गाय और बैल के सिंग को ऑइलपेंट और किसी भी तरह कि सजावट इसलिए नहीं करनी चाहिए क्योंकि सिंग चंद्रमा से आने वाली ऊर्जा को अवशोषित करते शरीर को देते है| अगर इसे पेंट कर दिया जाए तो वह प्रक्रिया बाधित होती है|
21. अगर गाय का गौमूत्र नीचे जमीन पर गिर जाये तो क्या उसे हम अर्क बनाने में उपयोग कर सकते है?
हीं, फिर उसे केवल कृषि कार्य के उपयोग में ले सकते है|
22. भिन्न प्रांत की नस्ल वाली गाय को किसी दूसरे वातावरण में पाला जाये तो उसकी क्या हानियाँ है?
भिन्न-भिन्न नस्लें अपनी-अपनी जगह के वातावरण के अनुरूप बनी है अगर हम उन्हे दूसरे वातावरण में ले जा कर रखेंगे तो उन्हें भिन्न वातावरण में रहने पर परेशानी होती है जिसका असर गाय के शरीर एवं गव्यों दोनों पर पड़ता है| और आठ से दस पीड़ियों के बाद वह नस्ल बदल कर स्थानीय भी हो जाती है| अतः यह प्रयोग नहीं करना चाहिए|
23. क्या ताजा गौमूत्र से ही चंद्रमा अर्क बना सकते है, पुराने से नहीं?
हाँ, चंद्रमा अर्क सूर्योदय से पहले चंद्रमा की शीतलता में बनाया जाता है|
24. गाय का घी और उसके उत्पाद महंगे क्यों होते है?
एक लीटर घी बनाने में तीस लीटर दूध की खपत होती है जिसका मूल्य कम से कम 30 रु. लीटर के हिसाब से 900 रुपये केवल दूध का होता है| और इसे बनाने में मेहनत आदि को जोड़ दिया जाये तब घी का न्यूनतम मूल्य 1200 रुपये प्रति लीटर होता है|
25. अगर थोड़ा सा भी दही नहीं हो तब दूध से दही कैसे बनाएँ?
हल्के गुन-गुने दूध में नींबू निचोड़ कर दही जमाया जा सकता है| इमली डाल कर भी दही जमाया जाता है| गुड़ की सहायता से भी दही जमाया जाता है| शुद्ध चाँदी के सिक्के को गुन-गुने दूध में डालकर भी दही जमाया जा सकता है|
26. गौमाता और विदेशी काऊ में अंतर कैसे पहचाने?
गौमाता एवं विदेशी काऊ में अंतर पहचानना बहुत ही सरल है| सबसे पहला अंतर होता है गौमाता का कंधा (अर्थात गौमाता की पीठ पर ऊपर की और उठा हुआ कुबड़ जिसमें सूर्यकेतु नाड़ी होती है), विदेशी काऊ में यह नहीं होता है एवं उसकी पीठ सपाट होती है| दूसरा अंतर होता है गौमाता के गले के नीचे की त्वचा जो बहुत ही झूलती हुई होती है जबकि विदेशी काऊ के गले के नीचे की त्वचा झूलती हुई ना होकर सामान्य एवं कसीली होती है| तीसरा अंतर होता है गौमाता के सिंग जो कि सामान्य से लेकर काफी बड़े आकार के होते है जबकि विदेशी काऊ के सिंग होते ही नहीं है या फिर बहुत छोटे होते है| चौथा अंतर होता है गौमाता कि त्वचा का अर्थात गौमाता कि त्वचा फैली हुई, ढीली एवं अतिसंवेदनशील होती है जबकि विदेशी काऊ की त्वचा काफी संकुचित एवं कम संवेदनशील होती है|
27. गाय क्या है?
गाय ब्रह्मांड के संचालक सूर्य नारायण की सीधी प्रतिनिधि है| इसका अवतरण पृथ्वी पर इसलिए हुआ है ताकि पृथ्वी की प्रकृति का संतुलन बना रहे| पृथ्वी पर जितनी भी योनियाँ है सबका पालन-पोषण होता रहे| इसे विस्तृत में समझने के लिए ऋगवेद के 28वें अध्याय को पढ़ा जा सकता है|

Milk or Poison!

मित्रो एक मादक तत्व होता है उसे कहते है BCM7 । BCM7 एक Opioid (narcotic) अफीम परिवार का मादक तत्व है. जो बहुत शक्तिशाली Oxidant ऑक्सीकरण एजेंट के रूप में मानव स्वास्थ्य पर अपनी श्रेणी के दूसरे अफीम जैसे ही मादक तत्वों जैसा दूरगामी दुष्प्रभाव छोडता है. 

जिस दूध में यह विषैला मादक तत्व बीसीएम 7 पाया जाता है, उस दूध को वैज्ञानिको ने ए1(A1) दूध का नाम दिया है. यह दूध उन विदेशी गौओं में पाया गया है जिन के डीएन मे 67 स्थान पर प्रोलीन न हो कर हिस्टिडीन होता है.।

आरम्भ में जब दूध को बीसीएम7 के कारण बडे स्तर पर जानलेवा रोगों का कारण पाया गया तब न्यूज़ीलेंड के सारे डेरी उद्योग के दूध का परीक्षण आरम्भ हुवा. सारे डेरी दूध पर करे जाने वाले प्रथम अनुसंधान मे जो दूध मिला वह बीसीएम7 से दूषित पाया गया. इसी लिए यह सारा दूध ए1 कह्लाया


तदुपरांत ऐसे दूध की खोज आरम्भ हुई जिस मे यह बीसीएम 7 विषैला तत्व न हो. इस दूसरे अनुसंधान अभियान में जो बीसीएम 7 रहित दूध पाया गया उसे ए2 नाम दिया गया. 


सुखद बात यह है कि विश्व की मूल गाय की प्रजाति के दूध मे, यह विष तत्व बीसीएम7 नहीं मिला,अर्थात भारतीय देसी नस्ल के गौवंश मे BCM 7 जहरीला तत्व नहीं मिला इसी लिए देसी गाय का दूध ए2 प्रकार का दूध पाया जाता है.

आधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधान से अमेरिका में यह भी पाया गया कि ठीक से पोषित देसी गाय के दूध और दूध के बने पदार्थ मानव शरीर में कोई भी रोग उत्पन्न नहीं होने देते. भारतीय परम्परा में इसी लिए देसी गाय के दूध को अमृत कहा जाता है. 


आज यदि भारतवर्ष का डेरी उद्योग हमारी देसी गाय के ए2 दूध की उत्पादकता का महत्व समझ लें तो भारत सारे विश्व डेरी दूध व्यापार में सब से बडा दूध निर्यातक देश बन सकता है.

ए1 दूध का मानव स्वास्थ्य पर दुष्प्रभाव
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जन्म के समय बालक के शरीर मे blood brain barrier नही होता . माता के स्तन पान कराने के बाद तीन चार वर्ष की आयु तक शरीर में यह ब्लडब्रेन बैरियर स्थापित हो जाता है .इसी लिए जन्मोपरांत माता के पोषन और स्तन पान द्वारा शिषु को मिलने वाले पोषण का, बचपन ही मे नही, बडे हो जाने पर भविष्य मे मस्तिष्क के रोग और शरीर की रोग निरोधक क्षमता ,स्वास्थ्य, और व्यक्तित्व के निर्माण में अत्यधिक महत्व बताया जाता है .


बाल्य काल के रोग Pediatric disease.
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आजकल भारत वर्ष ही में नही सारे विश्व मे , जन्मोपरान्त बच्चों में जो Autism बोध अक्षमता और Diabetes type1 मधुमेह जैसे रोग बढ रहे हैं उन का स्पष्ट कारण ए1 दूध का बीसीएम7 पाया गया है.


वयस्क समाज के रोग –Adult disease
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मानव शरीर के सभी metabolic degenerative disease शरीर के स्वजन्य रोग जैसे उच्च रक्त चाप high blood pressure हृदय रोग Ischemic Heart Disease तथा मधुमेह Diabetes का प्रत्यक्ष सम्बंध बीसीएम 7 वाले ए1 दूध से स्थापित हो चुका है.यही नही बुढापे के मांसिक रोग भी बचपन में ए1 दूध का प्रभाव के रूप मे भी देखे जा रहे हैं.
दुनिया भर में डेयरी उद्योग आज चुपचाप अपने पशुओं की प्रजनन नीतियों में '' अच्छा दूध अर्थात् BCM7 मुक्त ए2 दूध “ के उत्पादन के आधार पर बदलाव ला रही हैं. वैज्ञानिक शोध इस विषय पर भी किया जा रहा है कि किस प्रकार अधिक ए2 दूध देने वाली गौओं की प्रजातियां विकसित की जा सकें.


डेरी उद्योग की भूमिका
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मुख्य रूप से यह हानिकारक ए1 दूध होल्स्टिन फ्रीज़ियन प्रजाति की गाय मे ही मिलता है, यह भैंस जैसी दीखने वाली, अधिक दूध देने के कारण सारे डेरी उद्योग की पसन्दीदा गाय है. होल्स्टीन फ्रीज़ियन दूध के ही कारण लगभग सारे विश्व मे डेरी का दूध ए1 पाया गया . विश्व के सारे डेरी उद्योग और राजनेताओं की आज यही कठिनाइ है कि अपने सारे ए1 दूध को एक दम कैसे अच्छे ए2 दूध मे परिवर्तित करें. आज विश्व का सारा डेरी उद्योग भविष्य मे केवल ए2 दूध के उत्पादन के लिए अपनी गौओं की प्रजाति मे नस्ल सुधार के नये कार्य क्रम चला रहा है. विश्व बाज़ार मे भारतीय नस्ल के गीर वृषभों की इसी लिए बहुत मांग भी हो गयी है. साहीवाल नस्ल के अच्छे वृषभ की भी बहुत मांग बढ गयी है.
सब से पहले यह अनुसंधान न्यूज़ीलेंड के वैज्ञानिकों ने किया था.परन्तु वहां के डेरी उद्योग और सरकारी तंत्र की मिलीभगत से यह वैज्ञानिक अनुसंधान छुपाने के प्रयत्नों से उद्विग्न होने पर, 2007 मे Devil in the Milk-illness, health and politics A1 and A2 Milk” नाम की पुस्तक Keith Woodford कीथ वुड्फोर्ड द्वारा न्यूज़ीलेंड मे प्रकाशित हुई. उपरुल्लेखित पुस्तक में विस्तार से लगभग 30 वर्षों के विश्व भर के आधुनिक चिकित्सा विज्ञान और रोगों के अनुसंधान के आंकडो के आधार पर यह सिद्ध किया जा सका है कि बीसीएम7 युक्त ए1 दूध मानव समाज के लिए विष तुल्य है.


इन पंक्तियों के लेखक ने भारतवर्ष मे 2007 में ही इस पुस्तक को न्युज़ीलेंड से मंगा कर भारत सरकार और डेरी उद्योग के शीर्षस्थ अधिकारियों का इस विषय पर ध्यान आकर्षित कर के देसी गाय के महत्व की ओर वैज्ञानिक आधार पर प्रचार और ध्यानाकर्षण का एक अभियान चला रखा है.परन्तु अभी भारत सरकार ने इस विषय को गम्भीरता से नही लिया है.


डेरी उद्योग और भारत सरकार के गोपशु पालन विभाग के अधिकारी व्यक्तिगत स्तर पर तो इस विषय को समझने लगे हैं परंतु भारतवर्ष की और डेरी उद्योग की नीतियों में बदलाव के लिए जिस नेतृत्व की आवश्यकता होती है उस के लिए तथ्यों के अतिरिक्त सशक्त जनजागरण भी आवश्यक होता है. इस के लिए जन साधारण को इन तथ्यों के बारे मे अवगत कराना भारत वर्ष के हर देश प्रेमी गोभक्त का दायित्व बन जाता है.


विश्व मंगल गो ग्रामयात्रा इसी जन चेतना जागृति का शुभारम्भ है.
देसी गाय से विश्वोद्धार
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भारत वर्ष में यह विषय डेरी उद्योग के गले आसानी से नही उतर रहा, हमारा समस्त डेरी उद्योग तो हर प्रकार के दूध को एक जैसा ही समझता आया है. उन के लिए देसी गाय के ए2 दूध और विदेशी ए1 दूध देने वाली गाय के दूध में कोई अंतर नही होता था. गाय और भैंस के दूध में भी कोई अंतर नहीं माना जाता. सारा ध्यान अधिक मात्रा में दूध और वसा देने वाले पशु पर ही होता है. किस दूध मे क्या स्वास्थ्य नाशक तत्व हैं, इस विषय पर डेरी उद्योग कभी सचेत नहीं रहा है.


सरकार की स्वास्थ्य सम्बंदि नीतियां भी इस विषय पर केंद्रित नहीं हैं.
भारत में किए गए NBAGR (राष्ट्रीय पशु आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो) द्वारा एक प्रारंभिक अध्ययन के अनुसार यह अनुमान है कि भारत वर्ष में ए1 दूध देने वाली गौओं की सन्ख्या 15% से अधिक नहीं है. भरत्वर्ष में देसी गायों के संसर्ग की संकर नस्ल ज्यादातर डेयरी क्षेत्र के साथ ही हैं .
आज सम्पूर्ण विश्व में यह चेतना आ गई है कि बाल्यावस्था मे बच्चों को केवल ए2 दूध ही देना चाहिये. विश्व बाज़ार में न्युज़ीलेंड, ओस्ट्रेलिया, कोरिआ, जापान और अब अमेरिका मे प्रमाणित ए2 दूध के दाम साधारण ए1 डेरी दूध के दाम से कही अधिक हैं .ए2 से देने वाली गाय विश्व में सब से अधिक भारतवर्ष में पाई जाती हैं. यदि हमारी देसी गोपालन की नीतियों को समाज और शासन का प्रोत्साहन मिलता है तो सम्पूर्ण विश्व के लिए ए2 दूध आधारित बालाहार का निर्यात भारतवर्ष से किया जा सकता है.


यह एक बडे आर्थिक महत्व का विषय है.
छोटे ग़रीब किसनों की कम दूध देने वाली देसी गाय के दूध का विश्व में जो आर्थिक महत्व हो सकता है उस की ओर हम ने कई बार भारत सरकार का ध्यान दिलाने के प्रयास किये हैं.


परन्तु दुख इस बात का है कि देशी गाय की कोई भी बात कहो तो लोग विरोध मे उतर आते है ,चाहे कितना भी देश के लिए आर्थिक और समाजिक स्वास्थ्य के महत्व का विषय हो.


हमारे देश मे विदेशी कंपनियाँ जो दूध ,घी आदि बेच रही है उनसे तो पहले ही कोई आशा नहीं की जा सकती है लेकिन स्वदेशी के सबसे बढ़े ठेकेदार बाबा रामदेव भी जब ऐसे विषयो पर मौन धारण कर लेते है ,तो ऐसी स्थिति मे हम लोग आखिर क्या करें ? पिछले एक वर्ष से ये सवाल बाबा रामदेव जी से पूछा जा रहा है की पतंजलि का घी 100 % भारत के गौवंश के दूध से बना है या नहीं ?


एक बात समझ लीजिये मित्रो अगर बाबा रामदेव भी विदेशी जर्सी ,होलेस्टियन गायों के A2 दूध से घी बनाकर आपको बेच रहे है और आप खरीद रहे है, तो कहीं ना कहीं आप भी देशी गौवंश के हत्यारे है । क्योंकि गौ का मांस खाने वाले भारतीय गाय का ही मांस खाना अधिक पसंद करते है क्योंकि उनकी विदेशी गायों को बीमारियाँ बहुत होता है ।


आप खुद विचार करें मित्रो बाबा रामदेव जिन लोगो से विदेशी जर्सी गायों का दूध लेकर प्रतिदिन 1 लाख लीटर घी बना रहे है, तो वो लोग जिनसे बाबा दूध खरीदते है वो देशी गौवंश को क्यों पालेंगे ?? अगर वो देशी गौवंश नहीं पालेंगे तो देशी गाय काटने के लिए कत्लखाने जाएंगी
एक तो हमारा देशी गौवंश कटेगा और आप विदेशी जर्सी होएस्टियन का A2 दूध पीकर बीमार पड़ेंगे । 


इसलिए मित्रो आप सब से निवेदन है आप देशी गाय के दूध की मांग करना शुरू करें , अर्थशास्त्र का एक सिद्धांत है आप जैसे ही मांग खड़ी कर देंगे वो वस्तु आपको कुछ ही दिन मे मिलनी शुरू हो जाएगी । रामदेव जी पर दबाव बनाए उनसे प्रश्न करें कि क्या उनका घी 100 % भारत के देशी गौवंश के दूध से बना है या नहीं ।

पूरा पढ़ने के लिए आपका बहुत बहुत आभार ।

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जय गौ माता

पेड़ जो जगा देंगे आपका सोया भाग्य

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