Saturday, 22 October 2011

गोमूत्र खरीदेंगे बाबा रामदेव




स्टार न्यूज़ एजेंसी 
नागपुर (महाराष्ट्र). जी हां, यह आश्वासन योग गुरु बाबा रामदेव ने गोरक्षा के लिए 108 दिन तक चली विश्व मंगल गो ग्राम यात्रा आज यहां समापन सभा में दिया. रेशिम बाग मैदान में आयोजित समापन सभा को संबोधित करते हुए योग गुरु बाबा रामदेव ने कहा कि गोमाता आत्मउपचार और आत्मसाक्षात्कार का आधार है और यह ग्रामोदय से राष्ट्रोदय का प्रतीक भी है। उन्होंने कहा कि गाय कोई सांप्रदायिक प्राणी नहीं है, यह बिना किसी भेदभाव के सभी का पालन करती है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि आज गाय नहीं बची तो पूरी दुनिया का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा। बाबा रामदेव ने उपस्थित जनसमूह का आहवान करते हुए कहा कि सभी प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से गोसेवा करें। उन्होंने कहा कि प्रात:काल गोमूत्र का सेवन अनेक बीमारियों का शमन करता है और कब्जी होने की संभावना समाप्त हो जाती है। उन्होंने कहा कि गाय अगर दूध न भी दे तो भी सिर्फ गोमूत्र और गोबर से पर्याप्त आय हो सकती है। उन्होंने सात रुपये प्रति लीटर के भाव से गोमूत्र खरीदने का भरोसा भी दिलाया।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहनराव भागवत ने कहा कि एक समय था जब गाय और गांव की बात को पिछड़ी बात माना जाता था। लेकिन आज आधुनिक युग में यही मुख्य चिंतन की बात मानी जा रहा है। उन्होंने कहा कि शहर जितना बड़ा बनेगा, उतना ही बेखबर भी बनेगा। गांव में मनुष्य मनुष्य को पहचानता है, अत: वह स्वतंत्रता, समरसता और सुख का अनुभव करता है, और नियंत्रणविहीन व्यवस्था होते हुए भी अनुषासित समाज होता है। उन्होंने गोग्राम आधारित जीवन को विकेंद्रित और प्रकृति के समीप का युगानुकुल तरीका बताया। उन्होंने कहा कि यह यात्रा का उद्यापन है। केवल नारों से काम चलने वाला नहीं है। उन्होंने देशवासियों को आहवान किया कि वे गाय को जीवन में लाने के लिए दो चार कदम आगे बढ़ाएं।

विश्व मंगल गो ग्राम यात्रा के समापन समारोह के अवसर पर रेशिम बाग मैदान में मानों पूरा शहर उमड़ पड़ा। पूरा मैदान खचाखच भरा हुआ था। योग गुरू बाबा रामदेव के अलावा व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री मोहन भागवत के अलावा करवीर पीठ के शंकराचार्य श्री नृसिंह भारती सरस्वती, आचार्य महासभा के अधयक्ष स्वामी दयानंद सरस्वती, गोकर्ण पीठाधीश्वर शंकराचार्य राघवेश्वर भारती स्वामीजी, जैन मुनि पवित्र सागर महाराज, बौद्व संत भंते ज्ञान जगत महाराज, नवबौद्व संत भदंत राहुल बौधि, मौलाना बशीर कादरी आदि ने गोरक्षा के प्रति अपना संकल्प व्यक्त किया।

यात्रा के राष्ट्रीय सचिव शंकरलाल ने बताया कि 108 दिन चली विश्व मंगल गो ग्राम यात्रा ने देश का अनवरत भ्रमण किया और दस हजार उपयात्राओं ने पूरे देश को मथ डाला। गांव-गांव, गली-गली, नगर-नगर, डगर-डगर यात्राओं का अभूतपूर्व स्वागत हुआ। हिन्दू ही नहीं ईसाई और मुस्लिम समाज के लोगों ने भी इसमें बढ़-चढ़कर भाग लिया। देशभर में हजारों सामाजिक संगठन इसमें सहभागी हुए।

उन्होंने बताया कि विश्व के आधुनिक इतिहास में सबसे बडे जनमत संग्रह के रूप में यात्रा का हस्ताक्षर अभियान स्थापित हुआ है। करोड़ों लोगों ने अपने हस्ताक्षर द्वारा इस अभियान के प्रति अपना समर्थन व्यक्त किया है। यह वह संख्या है जो आज से पहले किसी भी अभियान के समर्थन में नहीं जुटी।

शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मधवाचार्य, रामानंदाचार्य, महामंडलेश्वर, अखाडे, जैन मुनि, बौद्व भिक्षु, नामधरी संत, वाल्मिकी संत, रामसनेही सम्प्रदाय, गायत्री परिवार, बह्मकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय, पातंजली योगपीठ, आर्ट ऑफ लिविंग, चिन्मय मिशन जैसे प्रतिनिधि संगठनों की सक्रिय भागीदारी भी यात्रा को यशस्वी बनाने में महत्वपूर्ण रही।

उन्होंने कहा कि यात्रा ने न केवल भारत की आस्था को झकझोरा है बल्कि देशभर में स्वावलंबन के बीज भी बोये हैं। निराश हृदयों में आशा का संचार किया है तो युवा शक्ति को आत्मविश्वास का अग्निमंत्र भी दिया है। उन्होंने कहा कि विश्व मंगल गो ग्राम यात्रा स्वतंत्र भारत का सबसे बड़ा और प्रभावी आंदोलन है और यह एक मौनक्रांति का सूत्रपात है। 

The Main Elements of Cow Urine and Their Functions



Many useful elements have been found in urine. Some of them are as below :
Urea
Urea is a major element found in urine and is the end product of protein metabolism. It is strong antibacterial agent.

Uric acid
Uric acid is similar to Urea and has strong antibacterial properties. In addition it helps to control cancer-causing substances.

Minerals
Minerals from urine can be very easily reabsorbed as compared to those derived from food. Urine probably contains more different types of minerals than those derived from food. Urine becomes turbid if left alone for a while This is because when enzyme present in urine dissolve urea and change it into ammonia then urine becomes strongly alkaline making it difficult to dissolve rich minerals. Therefore stale urine looks turbid This does not mean that it has decayed Urine with a higher ammonical disorder content when applied to the skin plays an important role in beautifying it.

Bioactive substance and hormones
Urokinase : Dissolves blood clots, helps in curing heart diseases and improves blood circulation.
Epithelium growth factor : Helps, repair and regenerate damaged tissues and cells
Colony stimulating factor : It is effective for cell division and multiplication.
Growth hormone : Shows different bioactive effects such as promotion of protein production, cartilage growth, fat decomposition.
Erythropoetine : Promotes production of red blood cells.
Gonadotropins : Promotes normalization of menstrual cycle and sperm production Kallikrin: -Releases kallidin that expands peripheral veins and reduce blood pressure.
Tripsyn inhibitor : Effective for prevention and healing of muscular tumor.
Allantoine : Heals wounds and tumors.
Anti-cancer substance : Anti-neoplaston, H-11 beta-iodole-acetic acid, directine, 3-methyl gloxal, etc. differ from chemotherapeutic drugs, which kill or injure all kinds of cells. They strongly prevent the multiplication of carcinogenic cells and return them to normal.

Nitrogen
It is diuretic & stimulates kidney naturally.
Sulphur
It increases intestinal peristalsis and purifies blood.
AmmoniaIt maintains integrity of body tissues and blood.
Copper
It checks excessive deposition of fat.
Iron
It maintains RBC counts in blood and stabilizes stamina.
Phosphate
It has litlhotriptic action.
Sodium
It purifies the blood and checks hyperacidity.
Potassium
It is appetizer and climinatcs muscle fatigue.
Magnese
It is antibacterial and prevents gas gangrene.
Carbolic Acid
It is antibacterial and prevents gas gangrene.
Calcium
It purifies blood & provide nutrition to bones; helps in coagulation of blood.
Salts
Antibacterial, Prevents Comma, and kctoacidois.
Vitamin A, B, C, D, E
They prevent excessive thirst, infuses vigour, and increase potency.
Lactose Sugar
Gives strength to heart, checks excessive thirst and giddiness.
Enzymes
Improve immunity, and promote the secretion of digestive juices.
Water
Controles the body temperature maintains the fluidity of blood.
Hippuric Acid
Excrete toxins through the urine.
Creatinine
It is antibacterial.
Swama Kshar
Antibacterial, improves immunity, and acts as an antidote.
Some hormones presents in 8-month pregnant cow which are very good for health.

गोमूत्र सभी रोगों की रामबाण औषधि- स्वामी अखिलेश्वरानंद



Cow as mother photo
Cow as mother photo
पठानकोट गाय भारतीय समाज-जीवन के सभी पहलुओं को र्स्पा और प्रभावित करती है। गाय में अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र, चिकित्साशास्त्र का समावेश है। यह कहना है स्वामी अखिलेश्वरानंद का। स्वामी जी विश्व मंगल गो-ग्राम यात्रा के स्वागत के लिए पठानकोट में आयोजित एक जनसभा को सम्बोधित कर रहे थे।
स्वामी जी ने कहा कि गाय अपने आप में एक सम्पूर्ण विज्ञान है। गोमूत्र सभी रोगों की रामबाण औषधि है। यह सम्पूर्ण शरीर का शोधन करके रागों का नाश करता है। उन्होंने कहा कि भारतीय शास्त्रों में गोविज्ञान की बात कही गयी है। गाय का दूध, मूत्र, गोबर आर्थिक विकास में उपयोगी है और वैज्ञानिक कसौटी पर पर भी खरे उतरे हैं। उन्होंने कहा कि गाय को अपने जीवन से दूर करने के कारण ही पंजाब की समृध्दि में कमी आयी है।
इससे पहले कठुआ में आयोजित स्वागत सभा में बोलते हुए गो विज्ञान अनुसंधान केंद्र के सुरो धवन ने गाय की उपयोगिता और पंचगव्य को लेकर हुए आधुनिक शोधों के बारे में जानकारी दी। उन्होंने कहा कि बाजार में उपलब्ध घी बनाने की प्रक्रिया दोषपूर्ण है। बाजारु घी स्वास्थ्य को हानि पहुंचाता है। जबकि ठीक प्रकार से बनाया गया गाय का घी हृदयरोगियों के लिए भी लाभदायक है।
यात्रा को जम्मू से हिमाचल प्रदो में प्रवो करने पर नूरपुर में यात्रा का भव्य स्वागत किया गया। कांगडा में आयोजित स्वागत -सभा में बोलते हुए ज्वाला देवी मंदिर के स्वामी सूर्यनाथ ने कहा कि स्वतंत्रता के बाद पं. जवाहर लाल नेहरु और उनके समर्थकों के कारण गोहत्या पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने वाला प्रस्ताव संसद में पारित नही हो सका। उन्होंने गोशालाओं मे सुधार करने की भी बात कही।
गोकर्ण पीठाधीश्‍वर जगद्गुरु शंकराचार्य राघवेश्वर भारती ने आंकडों का हवाला देते हुए कहा कि 1947 में एक हजार भारतीयों पर 430 गोवंश उपलब्ध थे। 2001 में यह आंकडा घटकर 110 हो गयी। और 2011 में यह आंकडा घटकर 20 गोवंश प्रति एक हजार व्यक्ति हो जाने का अनुमान है।
उन्होंने कहा कि गोमाता की रक्षा करके ही भारतमाता और प्रकृति माता की रक्षा की जा सकती है।
फिल्म अभिनेता सुरेश ओबेराय ने अपना व्यक्तिगत अनुभव बताते हुए कहा कि गोदुग्ध के सेवन से उनके पूरे परिवार में प्यार का माहौल बन गया है। उन्होंने कहा कि गोवंश के महत्व को तार्किक रुप से समझने की आवश्यकता है।
विश्व मंगल गो ग्राम यात्रा अब मैदानी हिस्से को छोडकर पहाडी क्षेत्रों में प्रवेश कर चुकी है। लेकिन यात्रा के स्वागत कार्यक्रमों और जनसमुदाय की भागीदारी में कोई कमी नहीं आयी है।

गोमूत्र में है बड़े गुण

देहरादून। अब गोमूत्र भी बिक रहा है और वह भी पूरे पांच रुपये प्रति लीटर। जी हां, उत्तराखंड के टिहरी जिले में कोटेश्वरम के आयुर्वेदाचार्य स्वामी विषुदानंद महाराज के गोतीर्थाश्रम में दवाईयां बनाने के लिए न केवल आश्रम की डेढ़ सौ गांवों का मूत्र एकत्र किया जाता है, बल्कि पांच रुपये प्रति लीटर की दर पर इसे बाहर से भी खरीदा जाता है।
उत्तराखंड गोसंव‌र्द्धन समिति के संरक्षण में चलने वाले स्वामी विषुदानंद महाराज के गोविज्ञान अनुसंधान केंद्र के अलावा योग गुरु स्वामी रामदेव के पतंजलि योगपीठ हरिद्वार में भी गोमूत्र के अर्क तथा जड़ी-बूटियों से कई रोगों की दवाइयां बनाई जाती हैं। स्वामी विषुदानंद ने बताया कि उनके केंद्र ने गोमूत्र के अर्क तथा जड़ी-बूटियों से हृदयरोग के लिए गोतीर्थ हृदयरक्षक, उच्च तथा निम्न रक्तचाप के लिए गोतीर्थ रक्तचाम नियंत्रक, मधुमेह के लिए गोतीर्थ मधुमेहहारि, शरीर के भीतरी तथा बाहरी अंगों की सूजन दूर करने के लिए गोतीर्थ शोधहर, मोटापा घटाने के लिए गोतीर्थ मेदोहर अर्क, जोड़ों के दर्द, गठिया, आर्थराइटिस के लिए गोतीर्थ पीडाहर, पेट के विकारों के लिए गोतीर्थ उदर रोग हर, खुजली और फोड़े, फुंसियों, दाद, रिंगवर्म तथा रक्त दोष जन्य विकारों के लिए गोतीर्थ अर्क, गुर्दो की कार्यप्रणाली तथा गुर्दे के रोगों के लिए गोतीर्थ लीवर टानिक, एड्स और यौन रोगों के लिए गोतीर्थ यौवन रक्षक अर्क एवं बवासीर के लिए गोतीर्थ बवासीर नाशक सहित लगभग 24 औषधियों का निर्माण किया है।
स्वामी विषुदानंद ने दावा किया कि गोमूत्र अर्क तथा जड़ी-बूटी मिश्रित औषधियों के सेवन से असाध्य और लाईलाज बीमारियां ठीक हो जाती हैं तथा ये औषधियां काफी सस्ती भी हैं जिससे गरीब लोग भी इनसे उपचार कर सकते हैं। उन्होंने बताया कि इन पवित्र औषधियों के सेवन से केवल शरीर की रक्षा ही नहीं होती बल्कि तन, मन, विचार, विकार तथा संस्कार सभी परिशुद्ध हो जाते हैं। लोगों में नई ऊर्जा का संचार होता है तथा मानसिक शांति की अनुभूति होती है।
गोमूत्र में फासफोरस, पोटाश, लवण, नाईट्रोजन, यूरिक अम्ल, हारमोन, साइटोकाइन्स तथा जीवाणु एवं विषाणु नाशक तत्व होते हैं। गव्य रसायन शास्त्र के मतानुसार गोमूत्र में नाईट्रोजन, गंधक, अमोनिया, तांबा, फास्फोरस, कार्बोलिक अम्ल, लेक्टोज, विटामिन ए, बी, सी, डी तथा ई, एन्जाइम, हिम्यूरिक अम्ल तथा क्रियेटिव तथा स्वर्णक्षार आदि तत्व पाए जाते हैं। दुधारू गाय के मूत्र में लेक्टोज भी मौजूद रहता है जो हृदय और मस्तिष्क के रोगों में बहुत लाभकारी है। आठ महीने की गाभन गाय के मूत्र में पाचक रस [हार्मोन्स] अधिक होते हैं।
आयुर्वेद के अनुसार गोमूत्र, लघु अग्निदीपक, मेघाकारक, पित्ताकारक तथा कफ और बात नाशक है और अपच एवं कब्ज को दूर करता है। इसका उपयोग प्राकृतिक चिकित्सा में पंचकर्म क्रियाएं तथा विरेचनार्थ और निरूहवस्ती एवं विभिन्न प्रकार के लेपों में होता है। आयुर्वेद में में संजीवनी बूटी जैसी कई प्रकार की औषधियां गोमूत्र से बनाई जाती हैं। गौमूत्र के प्रमुख योग गोमूत्र क्षार चूर्ण कफ नाशक तथा नेदोहर अर्क मोटापा नाशक हैं।
प्रसिद्ध आयुर्वेदाचार्य हरिओम शास्त्री के अनुसार गोमूत्र श्वांस, कास, शोध, कामला, पण्डु, प्लीहोदर, मल अवरोध, कुष्ठ रोग, चर्म विकार, कृमि, वायु विकार मूत्रावरोध, नेत्र रोग तथा खुजली में लाभदायक है। गुल्य, आनाह, विरेचन कर्म, आस्थापन तथा वस्ति व्याधियों में गोमूत्र का प्रयोग उत्तम रहता है। गोमूत्र अग्नि को प्रदीप्त करता है, क्षुधा [भूख] को बढ़ाता है, अन्न का पाचन करता है एवं मलबद्धता को दूर करता है। गोमूत्र से कुष्ठादि चर्म रोग भी दूर हो सकते हैं तथा कान में डालने से कर्णशूल रोग खत्म होता है और पाण्डु रोग को भी गोमूत्र समाप्त करने की क्षमता रखता है। इसके अलावा आयुर्वेदिक औषधियों का शोधन गोमूत्र में किया जाता है और अनेक प्रकार की औषधियों का सेवन गोमूत्र के साथ करने की सलाह दी जाती है। आयुर्वेद में स्वर्ण, लौह, धतूरा तथा कुचला जैसे द्रव्यों को गोमूत्र से शुद्ध करने का विधान है। गोमूत्र के द्वारा शुद्धीकरण होने पर ये द्रव्य दोषरहित होकर अधिक गुणशाली तथा शरीर के अनुकूल हो जाते हैं। रोगों के निवारण के लिए गोमूत्र का सेवन कई तरह की विधियों से किया जाता है जिनमें पान करना, मालिश करना, पट्टी रखना, एनीमा और गर्म सेंक प्रमुख हैं।
ब्रिटेन के डा. सिमर्स के अनुसार गोमूत्र खून में मौजूद दूषित कीटाणुओं का नाश करता है तथा पुराने घावों बढ़ते हुए मवाद [पीब] को रोकता है और यह बालों के लिए एक कंडीशनर की तरह उपयोगी है। दिल संबंधित रोगों, टीबी, और पेट की बीमारियों तथा गुर्दे संबंधी खराबियों में गोमूत्र और गाय के गोबर का मिश्रित इस्तेमाल काफी लाभकारी है। गुर्दे में पथरी के लिए 21 दिनों तक लगातार गोमूत्र का सेवन बड़ा लाभकारी सिद्ध होता है।
अमेरिका के डा. क्राफोड हैमिल्टन का दावा है कि गोमूत्र के प्रयोग से हृदयरोग दूर होते हैं और पेशाब खुलकर आता है। उनका कहना है कि कुछ दिन गोमूत्र के सेवन से धमानियां प्रसारित होती हैं, जिससे रक्त का दबाव स्वाभाविक होने लगता है। गोमूत्र से भूख बढ़ती है और पुराने गुर्दा रोग [रीनल फेल्योर व किडनी फेल्योर] की कारगर दवा है।
आयुर्वेदाचार्य बालकृष्ण आचार्य के अनुसार पंचगव्य चिकित्सा प्रणाली के द्वारा रोग प्रतिरोधी क्षमता बढ़ाने और सुदृढ़ करने हेतु आधुनिक तकनीकों द्वारा अनेक अनुसंधान किए गए हैं। इसी श्रृंखला में गोमूत्र का चूहों की रोगप्रतिरोधी क्षमता पर प्रभाव का अध्ययन किया गया जिसमें पाया गया कि गोमूत्र में कुछ ऐसे रसायन तत्व मौजूद हैं जो प्रतिरोधी तंत्र को मजबूत करते हैं और शरीर की जीवनी कैंसररोधी गुण भी होते हैं।
स्वामी विषुदानंद महाराज ने बताया कि गौ विज्ञान अनुसंधान केंद्र नागपुर द्वारा किए गए अनुसंधान में पाया गया कि गोमूत्र कैंसर के उपचार में भी लाभकारी है तथा साथ ही कैंसर के उपचार में इस्तेमाल होने वाली दवाईयों को भी प्रभावशाली बनाता है। उन्होंने बताया कि भारतीय चिकित्सा पद्धति में परंपरागत ढंग से उपयोग होने वाले तरीके विशुद्ध वैज्ञानिकता पर आधारित हैं। पंचगव्य चिकित्सा पद्धति केवल अपने देश में ही नहीं प्रभावी है, बल्कि इसके लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन भी अपने स्तर पर प्रभावी कदम उठाने की तैयारी कर रहा है।
चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार टीबी जैसे रोग में इन दवाओं के साथ गोमूत्र का उपयोग करने पर न केवल दवा की कम मात्रा से ही रोग नष्ट हो जाता है, बल्कि औषधि लेने के कार्यकाल में भी काफी कमी आ जाती है जिससे समय और धन दोनों की बचत होती है।
गोतीर्थाश्रम के आचार्य ने बताया कि गोमूत्र के तरह गोबर में भी अनेक औषधीय गुण मौजूद हैं। उन्होंने बताया कि इटली के अधिकांश सेनेटारियमों में गोबर का प्रयोग किया जाता है वहां हैजा तथा अतिसार के रोगियों में ताजा पानी में गोबर का रस घोलकर देना दोषरहित चिकित्सा मानी जाती है। जिस तालाब में हैजे के कीटाणु हो जाते हैं, उसमें गोबर डालने से उनका सफाया हो जाता है। उन्होंने बताया कि इंग्लैंड के प्रसिद्ध वैज्ञानिक प्रो जीई बीगेंड ने गोबर के अनेक प्रयोगों से सिद्ध कर दिया है कि गाय के ताजे गोबर में तपेदिक तथा मलेरिया के कीटाणु मर जाते हैं। उन्होंने बताया कि ताजे गोबर का रस पंचगव्य का मुख्य अंश है जिसके प्रयोग से देह, मन और बुद्धि के विकारों का नाश होता है। उन्होंने कहा कि गोपालन के द्वारा उनके दूध, घी, मक्खन तथा उनसे बने पदार्थो एवं गोमूत्र और गोबर से बनी औषधियों से देश के करोड़ लोग स्वस्थ्य और निरोग बनने के साथ ही इनके व्यवसाय से लोगों की आर्थिकी मजबूत होगी साथ ही देश भी अंतरराष्ट्रीय अंतर पर इन औषधियों का व्यवसाय कर आर्थिक रूप से मजबूत हो सकेगा।

पंचगव्य


गाय के दूधदहीघीगोमूत्र और गोबर का पानी को सामूहिक रूप से पंचगव्य कहा जाता है। आयुर्वेद में इसे औषधि की मान्यता है। हिन्दुओं के कोई भी मांगलिक कार्य इनके बिना पूरे नहीं होते।

[संपादित करें]पंचगव्य का चिकित्सकीय महत्व

पंचगव्य का निर्माण गाय के दूध, दही, घी, मूत्र, गोबर के द्वारा किया जाता है। पंचगव्य द्वारा शरीर के रोगनिरोधक क्षमता को बढाकर रोगों को दूर किया जाता है। गोमूत्र में प्रति ऑक्सीकरण की क्षमता के कारण डीएनए को नष्ट होने से बचाया जा सकता है। गाय के गोबर का चर्म रोगों में उपचारीय महत्व सर्वविदित है। दही एवं घी के पोषण मान की उच्चता से सभी परिचित हैं। दूध का प्रयोग विभिन्न प्रकार से भारतीय संस्कृति में पुरातन काल से होता आ रहा है। घी का प्रयोग शरीर की क्षमता को बढ़ाने एवं मानसिक विकास के लिए किया जाता है। दही में सुपाच्य प्रोटीन एवं लाभकारी जीवाणु होते हैं जो क्षुधा को बढ़ाने में सहायता करते हैं। पंचगव्य का निर्माण देसी मुक्त वन विचरण करने वाली गायों से प्राप्त उत्पादों द्वारा ही करना चाहिए।

[संपादित करें]पंचगव्य निर्माण

सूर्य नाड़ी वाली गायें ही पंचगव्य के निर्माण के लिए उपयुक्त होती हैं। देसी गायें इसी श्रेणी में आती हैं। इनके उत्पादों में मानव के लिए जरूरी सभी तत्त्व पाये जाते हैं। महर्षि चरक के अनुसार गोमूत्र कटु तीक्ष्ण एवं कषाय होता है। इसके गुणों में उष्णता, राष्युकता, अग्निदीपक प्रमुख हैं। गोमूत्र में नाइट्रोजन, सल्फुर, अमोनिया, कॉपर, लौह तत्त्व, यूरिक एसिड, यूरिया, फास्फेट, सोडियम, पोटेसियम, मैंगनीज, कार्बोलिक एसिड, कैल्सिअम, नमक, विटामिन बी, ऐ, डी, ई; एंजाइम, लैक्टोज, हिप्पुरिक अम्ल, कृएतिनिन, आरम हाइद्रक्साइद मुख्य रूप से पाये जाते हैं। यूरिया मूत्रल, कीटाणु नाशक है। पोटैसियम क्षुधावर्धक, रक्तचाप नियामक है। सोडियम द्रव मात्रा एवं तंत्रिका शक्ति का नियमन करता है। मेगनीसियम एवं कैल्सियम हृदयगति का नियमन करते हैं।

गाय महत्त्वपूर्ण है


गाय एक महत्त्वपूर्ण पालतू जानवर है। इससे उत्तम किस्म का दूध प्राप्त होता है। इसके बछड़े बड़े होकर गाड़ी खींचते हैं एवं खेतों की जुताई करते हैं। रेड सिन्धी , साहिवाल , गिर, देवनी, थारपारकर आदी नस्लें भारत में दुधारू गायों की प्रमुख नस्लें हैं । मूल, ओन्गोल, हल्लिकर,पुन्गानुर, सीरी, माल्नाद गिद्दा। नस्लें, रेड सिन्धी , साहिवाल , गिर, देवनी, थारपारकर आदी नस्लें भारत में दुधारू गायों की प्रमुख नस्लें हैं । भारत में गाय की २८ नस्लें पाई जाती हैं। हिन्दू, गाय को 'माता' (गौमाता) कहते हैं।
गाय व भैंस में मदकाल, गर्भवती करने का समय, गर्भ जांच का समय व गर्भकाल की सूचक सारणी-
  • सम्भोग काल - वर्ष भर, तथा गर्मिओं में अधिक
  • वर्ष में गर्मी के आने का समय - हर 18 से 21 दिन (गर्भ न ठहरने पर) ; 30 से 60 दिन में (व्याने के बाद)
  • गर्मी की अवधि - 20 से 36 घंटे तक
  • कृत्रिम गर्भधान व वीर्य डालने का समय - मदकाल आरम्भ होने के 12 से 18 घंटे बाद
  • गर्भ जांच करवाने का समय - कृत्रिम गर्भधान का टीका कराने के 60 से 90 दिनों में
  • गर्भकाल - गाय 275 से 280 दिन ; भैंस 308 दिन

गौ वत्स द्वादशी


गौ वत्स द्वादशी व्रत राजा युधिस्ठिर ने भगवान कृष्ण से कहा की महा भारत की लड़ाई में हजारों सैनिक,राजा और कई महँ व्यक्ति जैसे भीष्म ,द्रोण ,कलिंग राज ,कर्ण ,शल्य ,दुर्योधन आदि जो की मेरे सम्बन्धी थे,मारे गए | इस दौरान पांडवो ने कई अनकहे पाप किये | क्या कोई ऐसा उपाय है जिससे इन पापों को कम या समाप्त किया जा सकता है? भगवान कृष्ण ने कहा है कि एक बहुत प्रभावशाली 'गौ वत्स द्वादशी व्रत' करने से पापों का नाश होगा और उन्होंने व्रत की प्रक्रिया को समझाया | कई तपस्वी नम्व्रताधर पर्वत के ऊपर ध्यान में व्यस्त थे | भगवान शिव ने एक वृद्ध ब्राह्मण जो उम्र अधिक होने के कांप रहा था,का रूप धरा और सहारे के लिए छड़ी ले ली | ,जबकि देवी पार्वती ने एक गाय का रूप ले लिया | देवताओ और दानवों के द्वारा क्षीरसागर मंथन के दौरान पाँच गाये उत्पन्न हुई , नंदा, सुभद्रा, सुरभि सुशीला, और बहुला | ऐसा कहा जाता है की इनमे लोक माता पार्वती भी उत्पन्न हुई |
इस प्रकार उत्पन्न हुई पांच पवित्र गायों को क्रमशः महर्षि जमदाग्नि ,भारद्वाज, वशिष्ट ,असित और गौतम को देखभाल के लिए दिया गया | गायों के छः उत्पादों गोबर, मूत्र, दूध, दही और घृत को सभी के लिए पवित्र मन जाता है | गोबर शिव को प्रिय है और बिल्व पत्र के वृक्ष का स्रोत है | जिसे श्री वृक्ष के रूप में जाना जाता है और इसलिए देवी लक्ष्मी द्वारा पसंद किया जाता है | गाय का गोबर कमाल पुष्प का भी स्रोत है | गौ मूत्र ‘गुग्गल’ बीज का उत्पादक है जो दिखने में उत्तम और सुगन्धित होता है | यह गुग्गल बीज देवताओ के भोजन का हिस्सा है ,विशेषरूप से शिव जी के भोजन का | विश्व के यह सभी उपयोगी बीज गौ दूध से ही उपजते है | गौ घृत अमृत का मूल है जो देवता की भूख को संतुष्ट करता है | यह सभी जानते है की ब्राह्मण और गाय विश्व की दो प्रमुख प्रजातियों में से दो है | ब्राह्मण का हृदय वेदों का स्रोत है गायों यज्ञों का मूल है और सभी देवता के साथ संबद्ध हैं, गाय के सींग ब्रह्मा और विष्णु का प्रतिनिधित्व करते हैं|

गाय के सींग के शीर्ष पर विश्व के प्रमुख तीर्थ स्थित हैं, सींग के बीच में शिव का स्थान है| देवी गौरी गाय के माथे पर विराजमान है, कार्तिकेय नाक का प्रतिनिधित्व करते है और दोनों नथुनों में दो नाग कांबल और अश्वातर हैं| दोनों कानों में दो अश्विनी कुमार, चन्द्र और सूर्य आँखों में हैं; दांत वसुगण का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं | वरुण जीभ में है, खुर में सरस्वती, गंडस्थल यम और यक्ष का प्रतिनिधित्व करते है|.सभी वेड भी गाय में है |
भगवान कृष्ण ने युधिस्ठिर को बताया कि एक बार भगवान शिव ने कुछ महामुनि से कहा की वे दो दिनों के लिए एक गाय और बछड़े की रक्षा करे फिर वे उन्हें ले जायेंगे| मुनियों ने गाय का बहुत ख्याल रखा|थोड़ी देर बाद एक बाघ आया औरउसने गाय और बछडे को डराना शुरू किया| ऋषिगण डर गए और बाघ का ध्यान गाय और बछड़े से हटाने की कोशिश करने लगे| भय के कारण बछड़ा ऊपर और नीचे कूद शुरू कर दिया और तेज आवाज करने लगता है| एक पवित्र घंटी ध्रिन्धगिरी का उपयोग मुनि करते है ,जो कि ब्रह्मा ने मुनियों को ऐसे ऐसे हालात का सामना करने के लिए दी थी | गाय और बछड़े के खुर का निशान एक शिला में बन गया और अब संघर्ष के निशाँ के रूप में टूटे खुर के रूप में शिला पर स्थित है , जो वास्तव में एक शिव लिंग हैं|
आकाश से देवता और किन्नरों ने भगवान शंकर, जो बाघ का रूप ग्रहण किये थे और देवी पार्वती जिन्होंने गाय का रूप किया गया था, की आराधना की|जो लोग नर्मदा नदी पर जाते है और शम्भू तीर्थ पर शिव लिंग को छूते है उन्हें ब्रम्ह्हत्या के पाप से मुक्ति मिलती है|
इस बीच. महादेव ने बाघ के रूप को त्याग दिया और वृषभा पर सवार होकर दर्शन दिए |उनके बाईं ओर माता उमा थी | गणेश और कार्तिकेय के साथ नंदी ,महाकाल, श्रृंगी, वीरभद्र, चामुंडा और घंटकरना हैं, साथ ही मृतिका,भूत,यक्ष,राक्षस,देवता, दानव,गन्धर्व,मुनि,नाग और उनकी पत्निय भी है|. कार्तिक महीने की शुक्ल पक्ष द्वादशी को मुनियों ने गौ रूप दर्शिनी का व्रत किया | नंदिनी नामक गाय की उसके बछड़े के साथ पूजा की गयी |
यह व्रत राजा उत्तानपाद और उसकी पत्नी सुनीति के द्वारा लोकप्रिय बनाया गया था.| राजा के एक और पत्नी थी सुरुचि | सुरुचि ने रजा के पुत्र ध्रुव को ईर्ष्या के कारण मारने के कई प्रयास किये है, और हर बार ऐसे प्रयास से , ध्रुव बाहर चुस्त और तंदुरुस्त आया| तब सुरुचि ने सुनीति से पूछा कौन सा जादू था कि हर बार ध्रुव सुरक्षित बच गया | सुनीति ने बताया की वह नियमित रूप से व्रत करती है |तब सुरुचि ने भी व्रत किया और पुत्र प्राप्त किया ध्रुव एक ध्रुव तारे के रूप में आकाश में दिखाई देता है! व्रत के दोरान स्नान करके एक समय भोजन ले और गाय और बछड़े की पूजा करे |

Friday, 21 October 2011

Countries with the greatest proportion of Hindus


Countries with the greatest proportion of Hindus from Hinduism by country (as of 2008):
  1.  Nepal 86.5%[138]
  2.  India 82%
  3.  Mauritius 54%[139]
  4.  Guyana 28%[140]
  5.  Fiji 27.9%[141]
  6.  Bhutan 25%[142]
  7.  Trinidad and Tobago 22.5%
  8.  Suriname 20%[143]
  9.  Sri Lanka 15%[144]
  10.  Bangladesh 9%[145]
  11.  Qatar 7.2%
  12.  Réunion 6.7%
  13.  Malaysia 6.3%[146]
  14.  Bahrain 6.25%
  15.  Kuwait 6%
  16.  United Arab Emirates 5%
  17.  Singapore 4%
  18.  Oman 3%
  19.  Belize 2.3%
  20.  Seychelles 2.1%[147]

Hindus do not eat beef


History of the "Sacred" Cow

Cow in India
Cow in Pune, India. Photo: Ville Miettinen.


Street cow, Delhi, India
Wandering cow in Delhi. Photo: Roshnii Rose.


Dressed up cow, Goa, India
Dressed-up cow in Goa. Photo: Dey Alexander.


Cow dung in India
Processing cow dung (gobar), which will be put to many uses. Photo: Eli.
In ancient India, oxen and bulls were sacrificed to the gods and their meat was eaten. But even then the slaughter of milk-producing cows was prohibited. Verses of the Rigveda refer to the cow as Devi (goddess), identified with Aditi (mother of the gods) herself.
Even when meat-eating was permitted, the ancient Vedic scriptures encouraged vegetarianism. One scripture says, "There is no sin in eating meat... but abstention brings great rewards." (The Laws of Manu, V/56)
Later, in the spiritually fertile period that produced Jainism andBuddhism, Hindus stopped eating beef. This was mostly like for practical reasons as well as spiritual. It was expensive to slaughter an animal for religious rituals or for a guest, and the cow provided an abundance of important products, including milk, browned butter for lamps, and fuel from dried dung.
Some scholars believe the tradition came to Hinduism through the influence of strictly vegetarian Jainism. But the cow continued to be especially revered and protected among the animals of India.
By the early centuries AD, the cow was designated as the appropriate gift to the brahmans (high-caste priests) and it was soon said that to kill a cow is equal to killing a brahman. The importance of the pastoral element in the Krishna stories, particularly from the 10th century onward, further reinforced the sanctity of the cow.

Cow-Related Practices

The cow remains a protected animal in Hinduism today and Hindus do not eat beef. Most rural Indian families have at least one dairy cow, a gentle spirit who is often treated as a member of the family.
The five products (pancagavya) of the cow — milk, curds, ghee butter, urine and dung — are all used in puja (worship) as well as in rites of extreme penance. The milk of the family cow nourishes children as they grow up, and cow dung (gobar) is a major source of energy for households throughout India. Cow dung is sometimes among the materials used for a tilak - a ritual mark on the forehead. Most Indians do not share the western revulsion at cow excrement, but instead consider it an earthy and useful natural product.
Despite their sacred status, cows don't seem very appreciated in India. Visitors are often surprised to see them walking neglected around city streets, living on garbage from the gutters. But the cow is honored at least once a year, on Gopastami. On this "Cow Holiday," cows are washed and decorated in the temple and given offerings in the hope that her gifts of life will continue.


Sunday, 2 October 2011

The Cow and Its Position in Indian Society



           The cow has a long and cherished tradition in Hindu folklore and mythology that dates back to the Vedic period.  All cows are descended from the symbolic cow of supreme abundance, the celestial cow, KAMADHENU.  Possessing the face of a lovely woman and yielding to her master all the milk that he desired, Kamadhenu today is sculpted and painted throughout India.
          Indians find it strange that their cows should be the great concern that they are to the rest of the world.  They also find it quite disgusting that others eat them.  And when Westerners point out that 335 million livestock in India are competing with people for food, the Indian smiles and shakes his head.  His patience usually comes to an end when someone suggests that those cows who no longer produce milk should, if not eaten, at least be killed for their hides.  In such cases a Hindu might point out that the cow is rarely referred to as an animal.  Usually it is reverently or tenderly called Mother Cow.  And it is not killed after its milk has dried up for much the same reason that you don't kill your dog when it begins to get old.  The slaughter of cows to an Indian ranks with the murder of any man.  In Indian mythology when the forces of Good save a population from destruction, they always save the women, children, and the cows.  Lord Krishna, one of the human forms of Vishnu, is associated with cows and is also known as Lord of the Cows.  Those who tend cows are promised special consideration, for the cow is the symbolic nourisher of the earth.
Living, I yield milk, butter and
     curd, to sustain mankind
My dung is as fuel used,
Also to wash floor and wall;
Or burnt, becomes the sacred ash
     on forehead,
When dead, of my skin are
     sandals made,
'Or the bellows at the blacksmith's
     furnace;
Of my bones are buttons made.....
     but of what use are you, O Man?
           For Indians, the above poem contains much truth.  An important relationship exists between man and cow in India.  Each is an absolute necessity for the existence of the other.  Livestock in India are divided between cattle and water buffalo, with cattle having about a two to one edge in numbers.  The water buffalo does much of the plowing but by no means all.  Castrated bulls and cows both are used as general beasts of burden.  When plowing and planting are necessary, Indians need a great number of these livestock.  Furthermore, cow dung has long been the chief fertilizer used in India.  Human waste is not used in India as it has been, for example, in China or Japan.  Thus the Indian faces a considerable dilemma.  His fields certainly need the fertilizer, yet traditionally he has cooked his rice and boiled his tea with dried dung.  It is estimated that Indians would have to mine and somehow set up distribution facilities for about 35 million tons of coal a year for fuel if dung were not available.  As a source of food for children, milk and milk by-products play a valuable role as a supplier of protein.  This is especially important when on considers that Indians are for the most part vegetarians.  When you add to the above the importance of leather goods and such traditional uses as urine for the ritual cleansing of kitchens, the particular importance of cows to Indians becomes more apparent.
          This attitude, however, may be changing for some.  About 25% of India's hide production is from slaughtered cows.  Muslims in India do not share quite the same reverence for the cow and occasionally eat beef.  Scientific breeding of cattle for milk production is a part of many state-supported colleges and universities.  Major cities attempt to control the cows in congested downtown areas.  Bombay, Delhi, and Madras have all found the cow to be incompatible with the automobile. SADDHUS [holy men] and the Jan Sangh Party have both tried to force legislation in the past years to outlaw the killing of cows.  Riots in New Delhi and bitter arguments in the Indian parliament have taken place over this issue.  Can Indians continue to ignore cows as a source of protein?  Will the traditional Indian attitude toward the cow persist as India moves into the 21c?

COW PROTECTION---How can Hindu religious organisations felicitate those who never support & work for it?


COW PROTECTION---How can Hindu religious organisations felicitate those who never support & work for it?

COW PROTECTION-- What about the importance of cow in Vedas, and our DUTY towards it?
Read the wonderful verse from SamVeda --
" SADA(always) GAWO(cows) SUCHYO(pure) VISWADHAYAS(feed all)"
It means--
" Cows are always pure and cows feed all world".
The meaning of Vedic verses are very deep in nature and always right & relevent in all ages and everywhere. Vedic Sages had done great analysis and research over them and put forward the essence in the form of Upnishads ( various books of Vedas) and Gita ( further essence of Vedas and Upnishads).
Regarding PUNCHGAVYA( five products from cow i .e 1:milk2:curd3:clarified butter 4:cow dung and 5: cow urine,),a lot of research has also been done . Best results and effects of these 5 products have well been proved now.
Hindus well know about the importance and purity of cow and they should not need any of such clarifications.
All the clarifications are for non Hindus who are unaware of the facts about cow.
It is the duty of Hindus to try their best for the worldwide protection of cows. They should do it through persuasion and other means.
Not to speak of entire world, unfortunately even in India( country of their own) where they are in majority, cows are not protected.
It is so because many Hindus are carrying genes of Kansa,Ravan,Supnakha,Shakuni and Shishupal etc.and they have unfortunately grabbed key positions in India.
Some of them even don't hesitate to serve gomaans to guests.
Should we forgot Mangal Pandey and other forefathers and drag their souls to unrest.
If these evil minded( satanic) Hindus are allowed to dominate& not condemned, then further and final downfall and ruining of Hindus is certain to happen.
It is strange that many Hindu religious organizations( i, e. Sanatan Dharma, arya Samaj, Ramlila Committees etc) run after celebrities like Indian politicians who never vote for or work for cow protection in their field of activity (i.e. parliament or vidhan sabha) . They invite them as chief guests and felicitate them and so contribute towards the sin of cow slaughter.
We Hindus must ensure protection of cows and it will be definitely 1st step towards world peace.
You know! Cow is also a symbol of peace.

Hinduism,what is the importance of cow dung ,and why it is used in havans and homams ? 6 months ago


Hinduism,what is the importance of cow dung ,and why it is used in havans and homams ?

Dried cow dung is used in havans and homams. Because the cow eats only grass and dry paddy and other green leaves and pure water with vegetables. The cow did not eat non-veg items. so, the dried cow dung is used. Verses of the Rigveda refer to the cow as Devi (goddess), identified with Aditi (mother of the gods) herself. The cow continued to be especially revered and protected among the animals of India.

By the early centuries AD, the cow was designated as the appropriate gift to the brahmans (high-caste priests) and it was soon said that to kill a cow is equal to killing a brahman. The importance of the pastoral element in the Krishna stories, particularly from the 10th century onward, further reinforced the sanctity of the cow.

Cow-Related Practices

The cow remains a protected animal in Hinduism today and Hindus do not eat beef. Most rural Indian families have at least one dairy cow, a gentle spirit who is often treated as a member of the family.

The five products (pancagavya) of the cow — milk, curds, ghee butter, urine and dung — are all used in puja (worship) as well as in rites of extreme penance. The milk of the family cow nourishes children as they grow up, and cow dung (gobar) is a major source of energy for households throughout India. Cow dung is sometimes among the materials used for a tilak - a ritual mark on the forehead. Most Indians do not share the western revulsion at cow excrement, but instead consider it an earthy and useful natural product. Everything from a cow was used from their droppings to assistance with plowing the fields. The day-to-day work with the cow was much more important to the people's lives. Over time the private respect that each family had for this animal grew and became public and then became a part of the culture taking form in their religion. Today every part of the cow holds religious symbolism. For example the horns symbolize the Gods,

Why Hindus worship and give importance to the Cow only.?


Why Hindus worship and give importance to the Cow only.?

If so many animals that is living beings are there why hindus give importance to the cow.Is there any reason?
Hindus regard all living- creatures as sacred—mammals, fishes, birds and more. We acknowledge this reverence for life in our special affection for the cow. We do not worship her in the sense that we worship the Deity. To the Hindu, the cow symbolizes all other creatures. The cow is a symbol of the Earth, the nourisher, the ever-giving, un demanding provider. The cow represents life and the sustenance of life. The cow is so generous, taking nothing but water, grass and grain. It gives and gives and gives of its milk, as does the liberated soul give of his spiritual knowledge. The cow is so vital to life, the virtual sustainer of life, for many humans. The cow is a symbol of grace and abundance. Veneration of the cow instills in Hindus the virtues of gentleness, receptivity and connectedness with nature.

Some trace cow worship back to Lord Krishna, who is said to have first appeared as a cowherd and protector of cattle. Several other gods also lived for a time as cows, and the animals remain a powerful symbol of the religion.” (The Associated Press, May 14, 2005)

Although Hindus respect and honor the cow, they do not worship them in the same sense in which they worship God. Hindus considers all living things to be sacred, an attitude reflected in reverence for the cow.

In Hinduism, the cow is seen as a generous, ever-giving source, which takes nothing but that which is necessary for its own sustenance in return. Hindus treat the cow with the same respect accorded to the mother, as the cow is a vital sustainer of life, providing milk and a means of ploughing the earth to grow crops. The cow received such status as a result of the historical need of early agrarian Hindu civilization. The Rig Veda (4.28.1;6) recorded, “The cows have come and have brought us good fortune. In our stalls, contented may they stay! May they bring forth calves for us, many-colored, giving milk for Indra each day. You make, O cows, the think man sleek; to the unlovely you bring beauty. Rejoice our homestead with pleasant lowing. In our assemblies we laud your vigor.”

The cow thus represents Hindu values of selfless service, strength, dignity, and ahimsa, or non-violence. For this reason, although not all Hindus are vegetarian, they traditionally abstain from eating beef.
  • 4 years ago

पपीते के पत्ते कैंसर को सिर्फ 35 से 90 दिन में सही कर सकते हैं।

पपीते के पत्तो की चाय किसी भी स्टेज के कैंसर को सिर्फ 60 से 90 दिनों में कर देगी जड़ से खत्म, पपीते के पत्ते 3rd और 4th स्टेज के कैंसर...