Thursday, 27 December 2012

COW URINE - FEW FACTS

  • Milk producing cow’s urine has increased amount of lactose which is very beneficial in heart and brain disorders.
  • Eight month pregnant Cow Urine has increased amount of digestive juices.
  • Heals Stomach Related ailments such as indigestion and constipation.
  • Cow Urine is used in naturopathic treatment in preparation of medicinal Pastes; Sanjeevani Vati in Ayurveda and similar preparations are made by using Cow Urine.
Mainly, Cow Urine is used in preparation of
    • Gomutra Alkaline churn which is Kapha Nashak
    • Medohar ark (Cure for Obesity)
    • In cure of respiratory troubles
    • Urinary disorders
    • Severe Skin disease’s
    • Eye ailments
    • Chronic skin itching
    • In Ayurved, ear ache is known as Karnshool and is caused by imbalance in Vata Dosha; Cow Urine drops can cure this ailment
    • Many medicines are recommended to be taken with Gomutra in Ayurveda
As per Ayurved, Certain poisons can be refined and purified if soaked in Gomutra for 3 days before there safe and effective use on human body;
For Example:
    • Dhatura (Dhatura metel) seeds (with shell peeled off) are considered purified after soaking inGomutra for 12 hours.
    • Cow Urine can be used for purification of Guggul (Comniphera Mukul), Loha (Iron) and Bhalataka (Semecarpus Anacardium)
    • Detoxification of Aconite (Aconitum Napellus; Kuchla in Hindi)
    • For purification and detoxification of Gold and Silver

PANCHGAVYA


Panchagavya is a group of derivatives of 5 elements obtained from cows i.e.
  • Cow Urine
  • Cow Dung (Gomaye)
  • Cow milk
  • Cow Curd (Godadhi)
  • Cow Ghee (Goghrta)
It can be considered as a gift from the heavens for the absolute well-being and good health of human beings.
Ancient scriptures such as “Bhel Samhita”, “Kashyap samhita”, “Charak samhita”, “Sushrutu Samhita”, “Gad Nigraha” & “Ras Tantra Saar”, speak highly about the divinity and significance of Panchagavya in human life.
It is believed that consumption of Panchagavya results in removal of physical as well as mental disorders and is an enhancer of Life force Energy, Physical Strength & Life Span.
Regular consumption of Panchagavya results in
  • The removal of slow poisons from the body,
  • Miraculous healing of food addictions,
  • Cure from side effects of Alcohol & Tobacco consumption as well as Atmospheric Pollutants
  • Strengthening of immune system
Panchagavya is prepared by the mixture of
  • 1 part – Cow Ghee
  • 1 part – Cow Urine
  • 2 parts – Cow Curd
  • 3 parts – Cow Milk
  • ½ part – Cow Dung
The different constituents of Panchagavya have specific & unique healing properties and hence each of it can be used individually too for treatments of diseases and their prevention.

COW URINE


  • Gomutra is 95% water, 2.5% urea, and the remaining 2.5% is a mixture of minerals, salts, hormones and enzymes.
  • Cow Urine is bitter, sharp and alkaline.
  • Carbolic acid in Cow Urine is responsible for its property of cleanliness and purity.
  • Cow Urine consists of
    • Phosphate
    • Potash
    • Lavan (salt)
    • Nitrogen
    • Uric Acid
    • Sodium Chloride
    • Calcium
    • Phosphorus
    • Lactose
    • Vitamin A, B, C, D, E
    • Enzymes
    • Hipuric Acid
    • Creatinin and Gold Acids

Panchagavya is prepared by the mixture of



  • 1 part – Cow Ghee
  • 1 part – Cow Urine
  • 2 parts – Cow Curd
  • 3 parts – Cow Milk
  • ½ part – Cow Dung

Thursday, 20 December 2012

शुरू होगा देश और प्रदेश का पहला गौ-अभयारण्य


सुसनेर के सालरिया में शुरू होगा देश और प्रदेश का पहला गौ-अभयारण्य
तीन चरण में होगा निर्माण, अभयारण्य में गोबर, गौ-मूत्र, पंचगव्य पर होगा अनुसंधान



 
मध्यप्रदेश के शाजापुर जिले की तहसील सुसनेर के ग्राम सालरिया में कामधेनु गौ-अभयारण्य इसी माह शुरू हो जायेगा। प्राचीन समय में गाय को प्राप्त सम्मान एवं गरिमा को ध्यान में रखते हुए अभयारण्य में भारतीय गौ-वंश की नस्लों के संरक्षण एवं संवर्धन के व्यापक इंतजाम किये जायेंगे। कामधेनु अभयारण्य भोपाल से लगभग 200 और उज्जैन से लगभग 114 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। अभयारण्य के उत्तर में राजस्थान का झालावाड़ जिला, उत्तर-पूर्व में राजगढ़, पूर्व में सीहोर, दक्षिण में देवास और पश्चिम में उज्जैन, रतलाम एवं मंदसौर जिले रहेंगे।
अभयारण्य में गाय के गोबर और गौ-मूत्र से कीटनाशक का निर्माण, गौ-वंश के लिये चारागाहों का विकास, लावारिस और दान में प्राप्त और पुलिस द्वारा जप्त गायों के लिये आवास, आहार की सुनिश्चितता तथा गौ-वंश के निर्भय एवं स्वतंत्रत विचरण के लिये पर्याप्त व्यवस्था रहेगी। गौ-वंश के लिये प्राकृतिक और स्वाभाविक वातावरण का निर्माण भी अभयारण्य का प्रमुख लक्ष्य है।
मध्यप्रदेश सरकार की पहल पर शुरू होने जा रहे इस गौ-अभयारण्य में गाय से प्राप्त होने वाले गोबर, गौ-मूत्र, पंचगव्य आदि के इस्तेमाल पर शोध, अन्वेषण और अनुसंधान किया जायेगा। गाय के प्रति समाज की आस्था को देखते हुए अभयारण्य को सुंदर स्वरूप में विकसित किया जा रहा है। तीन चरण में इसका समग्र रूप से विकास करवाया जायेगा। विभिन्न विभाग यहाँ अपनी गतिविधियाँ संचालित करेंगे। अभयारण्य में गौ-वंश के लिये जल की पर्याप्त व्यवस्था रहेगी। इसके लिये तालाबों का निर्माण करवाया जायेगा। पशु-चारे के लिये मक्का तथा बरसीम की खेती होगी। वन विभाग बड़े पैमाने पर चारा उत्पादन की योजना चलायेगा। अभयारण्य की बाउण्ड्री वॉल के लिये खंतियाँ बनाई जायेंगी, जिस पर वन विभाग वृक्षारोपण करेगा। गायों के लिये बनाये जाने वाले शेड्स पर सोलर पेनल स्थापित किये जायेंगे, जिसके माध्यम से अभ्यारण्य में प्रकाश की व्यवस्था रहेगी।
ग्राम सालरिया की 472.63 हेक्टेयर भूमि पर बनने वाले इस अभयारण्य की कुल अनुमानित लागत डेढ़ करोड़ से अधिक आयेगी। यह राशि पहले चरण में अभयारण्य के अधोसंरचना विकास पर खर्च की जायेगी। अभयारण्य में गत वर्ष 2011-12 से विभिन्न निर्माण कार्य करवाये गये हैं। पहले चरण में लगभग 5 हजार गौ-वंश के रहने की व्यवस्था के लिये शेड-निर्माण, पशु अवरोधक खंती, चारा गोदाम, पानी की टंकी, कूप-निर्माण, पम्प-हाउस, सम्प वेल, पाइप-लाइन और कार्यालय आदि की व्यवस्था की गई है। भविष्य में प्रतिवर्ष एक हजार गौ-वंश के रहने के लिये शेड निर्मित होंगे।
अभयारण्य में प्रतिवर्ष 60 हजार हेक्टेयर भूमि पर उन्नत चारागाह विकसित किया जायेगा। चारागाह विकास और हरे चारे के उत्पादन का कार्य चरणबद्ध रूप से होगा। अभयारण्य में विद्युत की भी पर्याप्त व्यवस्था रहेगी। दूसरे चरण में जैविक खाद निर्माण, गौ-वंश में नस्ल-सुधार का कार्य और पंचगव्य एवं गौ-मूत्र से औषधि निर्माण जैसे महत्वपूर्ण कार्य होंगे। अपराम्परागत ऊर्जा स्रोतों जैसे गोबर गैस से विद्युत उत्पादन का कार्य भी इसी चरण में होगा। दीर्घजीवी और पक्षियों को आकर्षित करने वाले वृक्ष भी दूसरे चरण में लगाये जायेंगे। बड़े स्तर पर गाय के दूध से बनने वाले घी का निर्माण तथा उसके विपणन का कार्य भी यहाँ होगा।
तीसरे चरण में देश में उपलब्ध 34 गौ-वंशीय नस्लों के संरक्षण का कार्य होगा। पंजीकृत गौ-शालाओं के लिये विभिन्न प्रकार की जैविक खाद और गौ-मूत्र से बनने वाली औषधि के निर्माण, बेहतर पशु-पालन, चारागाह विकास आदि विषयों पर प्रशिक्षण की व्यवस्था की जायेगी।

शुरू होगा देश और प्रदेश का पहला गौ-अभयारण्य


सुसनेर के सालरिया में शुरू होगा देश और प्रदेश का पहला गौ-अभयारण्य
तीन चरण में होगा निर्माण, अभयारण्य में गोबर, गौ-मूत्र, पंचगव्य पर होगा अनुसंधान



 
मध्यप्रदेश के शाजापुर जिले की तहसील सुसनेर के ग्राम सालरिया में कामधेनु गौ-अभयारण्य इसी माह शुरू हो जायेगा। प्राचीन समय में गाय को प्राप्त सम्मान एवं गरिमा को ध्यान में रखते हुए अभयारण्य में भारतीय गौ-वंश की नस्लों के संरक्षण एवं संवर्धन के व्यापक इंतजाम किये जायेंगे। कामधेनु अभयारण्य भोपाल से लगभग 200 और उज्जैन से लगभग 114 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। अभयारण्य के उत्तर में राजस्थान का झालावाड़ जिला, उत्तर-पूर्व में राजगढ़, पूर्व में सीहोर, दक्षिण में देवास और पश्चिम में उज्जैन, रतलाम एवं मंदसौर जिले रहेंगे।
अभयारण्य में गाय के गोबर और गौ-मूत्र से कीटनाशक का निर्माण, गौ-वंश के लिये चारागाहों का विकास, लावारिस और दान में प्राप्त और पुलिस द्वारा जप्त गायों के लिये आवास, आहार की सुनिश्चितता तथा गौ-वंश के निर्भय एवं स्वतंत्रत विचरण के लिये पर्याप्त व्यवस्था रहेगी। गौ-वंश के लिये प्राकृतिक और स्वाभाविक वातावरण का निर्माण भी अभयारण्य का प्रमुख लक्ष्य है।
मध्यप्रदेश सरकार की पहल पर शुरू होने जा रहे इस गौ-अभयारण्य में गाय से प्राप्त होने वाले गोबर, गौ-मूत्र, पंचगव्य आदि के इस्तेमाल पर शोध, अन्वेषण और अनुसंधान किया जायेगा। गाय के प्रति समाज की आस्था को देखते हुए अभयारण्य को सुंदर स्वरूप में विकसित किया जा रहा है। तीन चरण में इसका समग्र रूप से विकास करवाया जायेगा। विभिन्न विभाग यहाँ अपनी गतिविधियाँ संचालित करेंगे। अभयारण्य में गौ-वंश के लिये जल की पर्याप्त व्यवस्था रहेगी। इसके लिये तालाबों का निर्माण करवाया जायेगा। पशु-चारे के लिये मक्का तथा बरसीम की खेती होगी। वन विभाग बड़े पैमाने पर चारा उत्पादन की योजना चलायेगा। अभयारण्य की बाउण्ड्री वॉल के लिये खंतियाँ बनाई जायेंगी, जिस पर वन विभाग वृक्षारोपण करेगा। गायों के लिये बनाये जाने वाले शेड्स पर सोलर पेनल स्थापित किये जायेंगे, जिसके माध्यम से अभ्यारण्य में प्रकाश की व्यवस्था रहेगी।
ग्राम सालरिया की 472.63 हेक्टेयर भूमि पर बनने वाले इस अभयारण्य की कुल अनुमानित लागत डेढ़ करोड़ से अधिक आयेगी। यह राशि पहले चरण में अभयारण्य के अधोसंरचना विकास पर खर्च की जायेगी। अभयारण्य में गत वर्ष 2011-12 से विभिन्न निर्माण कार्य करवाये गये हैं। पहले चरण में लगभग 5 हजार गौ-वंश के रहने की व्यवस्था के लिये शेड-निर्माण, पशु अवरोधक खंती, चारा गोदाम, पानी की टंकी, कूप-निर्माण, पम्प-हाउस, सम्प वेल, पाइप-लाइन और कार्यालय आदि की व्यवस्था की गई है। भविष्य में प्रतिवर्ष एक हजार गौ-वंश के रहने के लिये शेड निर्मित होंगे।
अभयारण्य में प्रतिवर्ष 60 हजार हेक्टेयर भूमि पर उन्नत चारागाह विकसित किया जायेगा। चारागाह विकास और हरे चारे के उत्पादन का कार्य चरणबद्ध रूप से होगा। अभयारण्य में विद्युत की भी पर्याप्त व्यवस्था रहेगी। दूसरे चरण में जैविक खाद निर्माण, गौ-वंश में नस्ल-सुधार का कार्य और पंचगव्य एवं गौ-मूत्र से औषधि निर्माण जैसे महत्वपूर्ण कार्य होंगे। अपराम्परागत ऊर्जा स्रोतों जैसे गोबर गैस से विद्युत उत्पादन का कार्य भी इसी चरण में होगा। दीर्घजीवी और पक्षियों को आकर्षित करने वाले वृक्ष भी दूसरे चरण में लगाये जायेंगे। बड़े स्तर पर गाय के दूध से बनने वाले घी का निर्माण तथा उसके विपणन का कार्य भी यहाँ होगा।
तीसरे चरण में देश में उपलब्ध 34 गौ-वंशीय नस्लों के संरक्षण का कार्य होगा। पंजीकृत गौ-शालाओं के लिये विभिन्न प्रकार की जैविक खाद और गौ-मूत्र से बनने वाली औषधि के निर्माण, बेहतर पशु-पालन, चारागाह विकास आदि विषयों पर प्रशिक्षण की व्यवस्था की जायेगी।

पपीते के पत्ते कैंसर को सिर्फ 35 से 90 दिन में सही कर सकते हैं।

पपीते के पत्तो की चाय किसी भी स्टेज के कैंसर को सिर्फ 60 से 90 दिनों में कर देगी जड़ से खत्म, पपीते के पत्ते 3rd और 4th स्टेज के कैंसर...