Monday, 17 February 2014

अधूरा ज्ञान खतरना होता है।


33 करोड नहीँ 33 कोटि देवी देवता हैँ हिँदू धर्म मेँ। कोटि = प्रकार।

देवभाषा संस्कृत में कोटि के दो अर्थ होते है, कोटि का मतलब प्रकार होता है और एक अर्थ करोड़ भी होता।

हिन्दू धर्म का दुष्प्रचार करने के
लिए ये बात उडाई गयी की हिन्दुओ के 33 करोड़ देवी देवता हैं और अब तो मुर्ख हिन्दू खुद ही गाते फिरते हैं की हमारे 33 करोड़ देवी देवता हैं........

कुल 33 प्रकार के देवी देवता हैँ हिँदू धर्म मेँ:

12 प्रकार हैँ आदित्य: ,
धाता, मित, आर्यमा, शक्रा, वरुण, अँश, भाग, विवास्वान, पूष, सविता, तवास्था, और विष्णु...!

8 प्रकार हैँ वासु:,
धर, ध्रुव, सोम, अह, अनिल, अनल, प्रत्युष और प्रभाष।

11 प्रकार हैँ- रुद्र: ,हर,
बहुरुप,त्रयँबक,अपराजिता, बृषाकापि, शँभू, कपार्दी, रेवात, मृगव्याध, शर्वा, और कपाली।

एवँदो प्रकार हैँ अश्विनी और कुमार।

कुल: 12+8+11+2=33

अगर कभी भगवान् के आगे हाथ जोड़ा है तो इस जानकारी को अधिक से अधिकलोगो तक पहुचाएं। ।।

Sunday, 2 February 2014

गाय के दूध से ज्यादा उसका मूत्र और गोबर कीमती है

हिन्दू धर्म में गाय को माता का दर्जा दिया गया .. श्री कृष्ण जी को गाय प्रेम इतना अधिक था की वो गाय के ह्रदय में जा बसे , जब कृष्ण जी गाय के ह्रदय में जा बसे तो सम्पूर्ण देवी देवता(३३ करोड़ ) ने भी यही सोचा की जब कृष्ण गाय में निवास करेंगे तो हम भी गाय में ही निवास करेंगे.
श्री हरी विष्णु को गाय में निवास करता देखकर माता लक्ष्मी ने भी गाय से विनती की की उन्हें भी अपने शरीर में स्थान दे. गौ माता ने कहा की मेरे पास कोई जगह नही बची आप मेरे गोबर में निवास कर लें ,इसी कारण जब लक्ष्मी जी कि पूजा होती है तो गोबर का लेप लगाया जाता है.
. जब गंगा मैया ने देखा कि भगवन शिव भी गाय में निवास करने लगे तो उन्होंने भी गौ माता से शरण मांगी .गौ माता ने उन्हें मूत्र में स्थान दे दिया , यही वजह है कि गौ मूत्र इतना पावन मन जाता है और रोगों और तमाम असाध्य व्याधियों का उपचार कर देता है यह गौ मूत्र .
भोपाल गैस त्रासदी के बाद लाखो लोग मरे किन्तु वही एक बस्ती थी जहाँ के लोग स्वस्थ थे ,कारण यह था कि हर घर पर गाय के गोबर का लेप लगा था और पूरी बस्ती में श्यामा तुलसी जी का पौधा बहुतायत संख्या में था.
प्राचीन काल में लोग घर में घुसने से पहले हाथ पैर धोकर घर के बाहर बने गोबर के लेप पर पैर रखकर अन्दर आते थे जिससे कीटाणु अन्दर न आये.
आज देश में प्रतिदिन हजारों कि संख्या में गाय मारी जा रही हैं ख़ास तौर पर वो गाय जो दुधारू नही रहीं , स्वयं कई ग्वाले या आम लोग गाय को कसाइयों को बेच आते हैं.
गाय के दूध से ज्यादा उसका मूत्र और गोबर कीमती है , गाय का दूध ३० रुपये लीटर और गौमूत्र को अगर फिल्टर कर दें तो वो ६० से लेकर १५० रुपये लीटर तक बिक जाता है , गाय का गोबर से अच्छी खाद कोई भी नही.. हम रासायनिक खादों का प्रयोग करते हैं और बीमार पड़ते हैं और बीमार पड़ने पर अंग्रेजी दवा यानी कि खाद में भी अंग्रेज कमाए और उनकी खाद से जो बिमारी हो उसके इलाज का पैसा वो भी अंग्रेज कमाए.
इसी निति के तहत अंग्रेजों ने भारत में गौ वध शाला बहुत संख्या में खुलवाई और अपेक्षा कृत कम पढ़े लिखे मुस्लिमों को ये सिखा दिया कि गाय का मांस बेचने पर उन्हें बहुत कमाई होगी
आज इन मुस्लिमों को खुद नही पता कि जिस गाय को वो मारकर बेच रहे हैं उस गाय को जिन्दा रखकर उसकी अल्प सेवा करके उसके मूत्र और गोबर से वो कितना कमा सकते हैं .
यही हाल हिन्दू का है उन्हें भी नही पता कि गाय अगर दुधारू नही तब भी वो उसके मूत्र और गोबर से बहुत कमा सकते हैं ,इतना कमा सकते हैं जितना उस गाय को बेचने पर कभी नही कमा सकते
देश में रोजगार कि कमी नही ..कमी है सोच की .
अगर हम गौ पालन करें तो उसके मूत्र को प्युरीफाइड करने की विधि भी बहुत सरल है और इस मूत्र को हम स्वयं खुले बाजार में बेच सकते हैं अच्छे दाम पर या फिर कई दवाई कम्पनियाँ हमसे खरीद सकती हैं ये मूत्र.
गाय की गोबर की खाद को हम अच्छे दाम में बेच सकते हैं और स्वस्थ भारत के निर्माण में एक छोटा सा ही सही योगदान कर सकते हैं
गाय जिस घर में हो उस घर में कितने भी वास्तु दोष हों वो घर सदैव फलता फूलता ही रहता है ,गाय सभी वास्तु दोषों का अकेले निवारण कर देती है.
इस प्रकार गौ पालन एक ऐसी विधा है जिससे रोजगार ,धर्म ,देश और समाज कल्याण और साथ ही आत्म निर्भरता के लिए कई रास्ते खुलते हैं
अगर आप गाय पाल नही सकते तो कई लोग मिलकर किसी एक को सहयोग करें की वो व्यक्ति गाय पाले और आप मानसिक और आर्थिक सहयोग प्रदान करें ऐसे लोगों को.
जिसने की शर्म
उसके फूटे कर्म

पपीते के पत्ते कैंसर को सिर्फ 35 से 90 दिन में सही कर सकते हैं।

पपीते के पत्तो की चाय किसी भी स्टेज के कैंसर को सिर्फ 60 से 90 दिनों में कर देगी जड़ से खत्म, पपीते के पत्ते 3rd और 4th स्टेज के कैंसर...